Friday, November 18, 2011

पर्दा, जर्दा और नामर्दा बनाम भोपाल

कल सारा दिन भोपाल में था काम काम, अपने मोबाईल नोकिया हेंडसेट का सॉफ्टवेर अपडेट करवाया, शाम को कुछ दोस्तों से मिला- सारिका, अविनाश, सौरभ, स्याग भाई, त्रिपाठी जी, अशोक केवट, पल्लवी, जीतेंद्र, सत्यजीत, जैसे प्यारे दोस्त जो अब कही इतने मशगुल हो गए है कि लगता है किसी संग्रहालय से निकल आये है. प्रेस के अजीज़ दोस्त- श्याम तोमर जो भास्कर रायपुर में काम करते है, से लगभग तीन साल बाद मिला मजा आ गया, ज्योत्सना पन्त से भी एक लंबे अरसे बाद मुलाक़ात हुई.... भोपाल की पत्रकारिता के नए रंग जो कमोबेश रोज बदलते है को फ़िर से देखा, बोर्ड ऑफिस के सामने वाला इंडियन काफी हाउस और बड़ा साम्भर के साथ उम्दा काफी, प्रेस के साथियों से मुलाक़ात -वही हडबडी, बेचैनी, माल बिकने का जोश और रोष, इलेक्ट्रानिक मीडिया के दोस्तों को टी आर पी का तनाव और फ़िर भागते दौडते कैमरा उठाकर कही पहुँचने की जल्दी .....भोपाल से बहुत सारे यादें जुडी है जब भी इस शहर में जाता हूँ तो " नास्टेल्जिक " हो जाता हूँ, शहर छोडने के बाद शहर पूरा का पूरा मेरे अंदर दौडता है जैसे....धौकनी में सांस और फ़िर वो सारे रास्ते, अड्डे, गालियाँ और चौराहे मानो जीवंत हो उठते है लोगो की व्यवहार और अब बदले हुए सब शख्स नजर आते है....ये भोपाल है जो पर्दा, जर्दा और नामर्दा के ही जाना जाता है बाबू.......

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