Tuesday, November 1, 2011

आखिर वही हुआ जिसका डर था म् प्र स्थापना दिवस के कार्यक्रम में बेचारे बच्चो को ही धूप झेलना पडी , बड़े ही अशिष्ट ढंग से आयोजित कार्यक्रम में फ़िल्मी गीतों पर ठुमकते बच्चे अपने गुरुओ के साथ पुरे मैदान में नाचते रहे और इनाम के नाम पर उन्हें एक लोहे का तमगा मिला पूरी टीम को, पानी तक की व्यवस्था नहीं थी बाकी तो छोडिये. मुझे शिक्षकों पर तरस आता है कि मालवा के समृद्ध इलाके में जहा लोकगीतों की इतनी भरमार है वहा गोविंदा के फिल्मो के गीत और भौंडे गीतों पर बच्चे ठुमक रहे थे, क्या विरासत की थाती को समझेंगे ये बच्चे ? एक आदिवासी नृत्य हुआ था जिसमे मंडला के मुडिया और बैगाओं का नृत्य था काश म् प्र में आदिवासियों को इतने कपडे ही मिल जाते जितने इन बच्चो ने पहन रखे थे तो मप्र का विकास ५५ वर्षों के शासकीय प्रयासों की झलक या उपलब्धि ही दिखा देता पर अफसोस आज भी आदिवासी नंगे -भूखे है, विस्थापित हो रहे है और मप्र के स्थापना दिवस पर हम उन्हें उन्नत खुशहाल और तरक्की में जुड़ा बता रहे है.....जय हो...........हम सब हमाम में लगातार नंगे हो रहे है और हमें शर्म भी नहीं है ...

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