Friday, November 11, 2011

बशीर बद्र साहब की एक नाजुक सी गज़ल............

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो

मुझे एक रात नवाज़[1] दे मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़त[2] भी अता[3] करे

तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब[4] है चांदनी

न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चांदनी

न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो

वो फ़िराक़[5] हो या विसाल[6] हो, तेरी याद महकेगी एक दिन

वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं

मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो

कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के

यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब[7] आ ज़रा और दिल के क़रीब आ

तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कोई डर न हो

शब्दार्थ:

  1. ↑ कृतार्थ कर दे

  2. ↑ सदगुण

  3. ↑ प्रदान करे

  4. ↑ सपनों में खोई हुई

  5. ↑ विरह
  6. ↑ मिलन

  7. ↑ प्रिय

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