Tuesday, November 1, 2011

मन की गाँठे

कहा तो ये भी था कि में उन सपनों में एक बार जरूर जाऊ जहां हम दोनों ने एक ज़िंदगी को एक साथ एक ही रूपहले परदे के एक ही तानो से बुनी जाली पर देखा था - पर आज ना वो सपने है, ना रूपहला पर्दा, ना वो जाल जो जीवन कहलाता है, ना वो सब जो अपना हो सकता था बस..व्यथा है जीवन की निरपेक्ष साँसे है और जंजाल है. फ़िर भी जीवन की धडकने चल रही है अशेष कुछ भी नहीं है और अलभ्य सा होता में लगातार जूझ रहा हूँ तुमसे, अपने आप से, हर उस शै से जो कुच्छ कह जाती है चुपके से मेरे कान में घनघना जाती है एक उन्मुक्त हंसी और फ़िर हर पल, हर घड़ी और हर जगह ठहाके और यादें!!! स्पन्दन ही जीवन है और इसे बनाए रखना मजबूती या मजबूरी, नहीं पता पर बहुत ठोस हूँ अभी भी टूटकर और बिछडकर अपनी ज़िंदगी से जिसे में सच में ज़िंदगी कहता, मानता और जानता हूँ.........जी जाउंगा फ़िर से एक लंबा पल जिसमे वही सपने, वही जाल, वही ताना-बाना- जिसे कबीर कहता था काहे का ताना काहे को धरनी....कौन तार से जब जोड़ी चदरिया झीनी झीनी चदरिया (मन की गाँठे)

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