Wednesday, November 23, 2011

शांति चाहिए ज़िंदा लोगों की आत्मा को

हफ्ते का हवन करता हूं। पहले स्वाहा सोम का, फिर मंगल का करता हूं।
बुध जले चूल्हे में, गुरु गले भट्टी में, बचे शुक्र का तो सर्वनाश करता हूं।
हफ्ते का हवन करता हूं। हैं बस शनि और रवि, जिन्हें अपना समझता हूं,
बाकी पांच दिनों का तो बस हवन करता हूं। टंगा रह जाता है कैलेंडर दरो-दीवार से,
मैं तो सुबह शाम तमाम करता हूं। दिन मेरे लिए धूप है बस, कुंड में झोंक कर मंगलगान करता हूं।
हफ्ते का हवन करता हूं। शांति, शांति, शांति। शुभ रात्रि, शुभ रात्रि, शुभ रात्रि।
ऊं चिकन करी, ऊं मटन करी, ऊं करी करी, ऊं नौकरी। कुछ नहीं मिलता तो कविता रचता हूं,
शब्दों का हवन करता हूं। शांति चाहिए ज़िंदा लोगों की आत्मा को, इसलिए हफ्ते का हवन करता हूं।
ऊं फट ऊं फटाक।
- बाबा नागार्जुन से प्रेरित

[रवीश कुमार से साभार]

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