Tuesday, November 22, 2011

मन की गाँठे

कोहरा तो घना था दिखना मुश्किल था नजदीक से देखने पर भी कुछ नजर नहीं आता था, बस लगा कि जैसे ज़िंदगी की शाम हो चली है, मै, हम, तुम, सब कही छिपे जा रहे है इस कोलाहल में और सब कुछ धुंधलके में खोता जा रहा है जैसे खो गए हो तुम कही... दूर बहुत दूर..................और सूरज की किरणों का कही पता नहीं, इस सर्द सुबह में थरथराती हल्की सी, मद्धम रोशनी और दूर तक पसरा सन्नाटा, गुनगुने से बड़े होते मन के ना पुरे होने वाले ख्वाब, अमिट इच्छाएं, और गहरे में कही डूबते और उगते हुए पश्चाताप, बस ऐसे ही कोलाहल और कोहरे में जीवन की नैया डूब रही है, चारों और शोर है, उजास और निरभ्र आसमान की तलाश है और फ़िर पड़े पड़े लगता है ये आगोश में पडी जिंदगी की सलवटें अब बदल देना चाहिए .........दास कबीर ने ऐसी ओढी ज्यों की त्यों धर दीनी, चदरिया झीनी रे झीनी.......(मन की गाँठे)

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