Thursday, January 5, 2012

(जिंदगी के प्रवचन - अपनो से दुखी होकर......)

कही दूर से मै समझा रहा हूँ अपने आप को कि बचो इस मोह पाश और बंधन से बचो...........पर मै तो एक अदना सा इंसान और बेहद घटिया, पापी, कुकर्मी, और लोभी, एक काया का बोझ लिए संसार के सागर में तैर रहा हूँ......सबसे शत्रुता लेकर जीवन में होड की दौड़ में दो-दो हाथ करते हुए सबसे भिड रहा हूँ, क्यों..........बस नाशवान तो सब है यह जानते बूझते हुए भी एक लड़ाई लड़ रहा हूँ पता नहीं बैर-भाव और रंजो-गम का हिसाब किताब लिए इस अंधी विनाशकारी सीढियों पर हांफता और जीवन के पल-पल का हिसाब रखता जिसमे पाने ही पाने का जोखा ज्यादा है और दिख नहीं रहा कि काल का गाल समेटे चला आ रहा है अपनी बही और वो सब जो एक ही झटके में कालातीत कर देगा सबको पर........ हम, तुम, मै, हम सब इन सबसे परे लगे है जोडने-घटाने में ........बचो, इस सबसे बचो वरना यही अभी नष्ट हो जायेंगे, भस्म हो जायेंगे, बचो सारे दुर्व्यसनों से और प्रलोभनों से ..बच सकते हो तो बचो- मोह माया से और बचा लों अपनो को भी इस अंधी खाई में जाने से .........घोर समय है, घोर अन्धेरा है ......सांझ की बेला है बचो.......बचो........बचो.....

(जिंदगी के प्रवचन - अपनो से दुखी होकर......)

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