Wednesday, January 25, 2012

बुद्धिजीवियों के उद्धार का ठेका

सत्यनारायण के साथ मुझे बांदा जाना था सुनील और बहादुर जा रहे है और मुझे भी शबरी पुरस्कार वितरण समारोह में जाना था पर हमने सिस्टम बनाए है जो आदमी को मारने के लिए ईजाद किये गए है आदमी को किस तरह से इतना हैरान परेशान किया जाए कि वो त्रस्त होकर गुलाम बन् जाए और फ़िर बिलकुल गुलामो की तरह से व्यवहार करने लगे.......एक गंदे नाले में पड़ा हुआ सिस्टम और बेहद धूर्त दर्जे के घटिया लोग, सिवाय मक्कारी और रूपया कमाने के जिन्हें कुछ ना आता हो और ऊपर से सरकारी मुलम्मा पहनकर ओढकर बिछाकर ये लोग किस लोकतंत्र की बात करते है .....शर्मनाक है यह सब, राज्य और कल्याणकारी राज्य का सपना संजोये हुए हमने १९५० को गणतंत्र बनाया था और कल उसकी बरसी है दुर्भाग्य की ऐसे लीचड लोग जिन्हें लोकतंत्र के "ल" में यकीन नहीं, ना आस्था- वो इस देश के बुद्धिजीवियों के उद्धार का ठेका लिए बैठे है.....खून खोल रहा है आज देश के नाम , नेताओं के नाम, भ्रष्ट ब्यूरोक्रेट्स के नाम, दो कौड़ी के बाबूओ के नाम.... दिल करता है कि बगावत करके सबको ठीक कर दू और तंत्र उखाड फेंकू..................रास्ता किधर है.........????

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