Nityanand Gayen की कलम से.............
अब कभी -कभी मैं
सूरज को सोचता हूं
उसके अकेलेपन को सोचता हूं
उसकी जलन की पीड़ा को सोचता हूं
कैसे सह रहा है वह
इस जलन को सदियों से
ख़ामोशी से ?
निथर हो कर
मैं यह सोचता हूं
जिंदगी की दौड़ में इतने लोग मिलते है कि सबके बारे में हम कभी याद नहीं रख पाते,बस यही सोचकर क्यों ना सिलसिलेवार सब बातों को लिखता रहूँ ताकि सब इसमे दर्ज हो जाए उनके बारे में जो कभी जीवन में आये टकराए और बगैर आवाज किये चुपचाप लौट गए-कब कहा नहीं पता पर उनकी बेचैनी साँसों का स्पंदन अभी तक गूंजता है मेरे भीतर लगता है कि सब कह रहे हो रास्ता किधर है शब्द उतर आते है कागज़ पर, एकाकार हो जाता हूँ उन भावनाओं और उन कोमल तंतुओं के साथ जो इंसान होने को परिभाषित करता है
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