Friday, January 20, 2012

बेवफ़ा हो जायें _अहमद फराज


इस से पहले के बेवफ़ा हो जायें
क्यों न ऐ दोस्त हम जुदा हो जायें

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल क्या से क्या हो जायें

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
और कहीं और मुब्तला हो जायें

इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जायें किमिया हो जायें

अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जायें

बन्दगी हम ने छोड़ दी है ‘फराज़’
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जायें

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