Friday, January 13, 2012

एक बार फ़िर गुलज़ार

तुम्हारे ग़म की डली उठा कर जबां पे रख ली है,
देखो मैंने वो क़तरा क़तरा पिघल रही है,
मैं क़तरा क़तरा ही जी रहा हूं
किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक्के
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!

-गुलज़ार

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