Thursday, January 5, 2012

(जिंदगी के प्रवचन - अपनो से दुखी होकर......)

एक बूझी हुई सी महिला, संसार के दुखो से घिरी हुई और संसार के संताप अपने सर रखकर रोज सोती है और फ़िर अल्लसुबह उठकर काम यहाँ इस बियाबान में एक घटिया से कमरे पर आ जाती है .सारा दिन चिढ चिढ और डाट-फटकार , बदतमीजी अपने मातहतो के साथ दुर्व्यवहार, रूपयों के प्रति आसक्ति, दूसरों को देखकर खीजना बस और फ़िर अपने गमो में किसी को शामिल ना कर पाना, ना ही बताने की कोई सदिच्छा.........कैसे चले रे ये जीवन.......बस चल रहा है.........छोड़ दो सब छोड़ दो, संसार त्याज्य है, सब नश्वर है, और मोह माया का तो कोई ठिकाना भी नहीं है......एक छोटे सी जगह पर बैठकर जीवन गवां रहे है नर नारी......अपनी गठरी बांधकर चले चलो..........बस यही सही समय है, चले जाओ, चले जाओ -दूर कही दूर ........वरना भुगतोगे बुरी तरह से भुगतोगे.......नौकरी, रूपया पैसा तभी ठीक है जब खुद भी जी पाओ और दूसरों के लिए भी सुख के नए रास्ते खोजो वरना तो सब अनुपयुक्त है.........भुगतोगे .सोच लों.........सोच लों.......

(जिंदगी के प्रवचन - अपनो से दुखी होकर......)

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