Wednesday, December 28, 2011

लेकिन लिख बैठा मैं झुलसे तन


लिखना तो चाहा था
टेसूवन
बौराए आम,
लेकिन लिख बैठा मैं
झुलसे तन
बदली के घाम।

निर्वसना शाखाएँ, पीले पत्ते, तिनके-
परखचे उड़े जाते कर्फ्यू वाले दिन के
लिखनी तो चाही थी-
गंध पवन,
वासंती शाम,
लेकिन लिख बैठा मैं
द्रोह दलन
जन के पथ बाम।

घाटे के बजट और फागुन दिन चढ़े भाव,
हमले पर हमले, पक्षों के बौने बचाव;
लिखनी तो चाही जय यात्राएँ,
नए तीर्थ धाम,
लेकिन लिख गई मुझसे
सुविधाएँ-
बस्ती बदनाम।

-स्व. नईम, देवास..

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