Thursday, December 15, 2011

वह नहीं यह होने के अर्थ पर विचार करता रहता हूँ

"यह जो मैं लिखता रहता था, अचानक लगा, हास्यास्पद था। मैं शब्द नहीं पा सका। मैंने संसार को देखा विशालकाय, स्पंदित, पत्थर के जंगले पर अपनी कुहनियाँ टिकाये हुए। नदियाँ बहती रहीं, पाल बादल को चीरता रहा,
सूर्यास्त गश खा गये।"
- चेस्लाव मीलोष।

और अक्सर बारम्बार
अपनी बुझती हुई सिगरेट के साथ
लाल मदिरा पीते हुए
वह नहीं यह होने के अर्थ पर विचार करता रहता हूँ
.....
-मिवोश (अनु: चंद्रकांत देवताले)


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