Monday, December 19, 2011

मन की गाँठे

ये कोहरे की एक शाम है सूरज बहुत लजाते हुए दिन भर कुछ ना दे पाने की खता और अपराध बोध में अभी अभी छुपा है, हवाएं अभी भी झूम रही है मानो पुरे वेग से सबको निचोड़ देंगी और फ़िर कोहराम मचाकर दम ले लेंगी, धूप मानो अपना चरित्र ही भूल गयी, दूर तक साय साय है, बेहद घना कोहरा है कही दूर से कोई गुजरता है तो भक् से गाड़ी का तेज बिखर जाता है और फ़िर एक सन्नाटा पसर जाता है कोई नजर नहीं आता इस प्रहर में.......जीवन जैसा हो रहा है यह समय, बिलकुल कुछ समझ नहीं आ रहा, बस आवाजों का शोर है और एक फीट तक भी देख नहीं पा रहा हूँ ना समय को, ना अपने आपको, ना सुन पा रहा हूँ पदचाप को और ना कुछ सूझ रहा है.......यह कैसा समय है यह कैसा चक्र है.... हर तरफ कोहरा है और कही से कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आती, कही से यह कोहरा छंटता नजर नहीं आता......क्या लिखा है और क्या होगा बेहद मायूसी है(मन की गाँठे)

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