Saturday, December 3, 2011

भीतर का भीतरी कोना। दो सफ़ेद लकड़ी की कुर्सियां। बीच में मेज़। दाईं तरफ़ शीशे की खिड़की। खिड़की के परे पेड़।

मैं हर रोज़ देखता हूं। पता नहीं, कौन-सा पेड़ है, जो धीरे-धीरे रोज़ झरता है, जैसे हम मृत्‍यु की ओर बढ़ते जाते हैं और कोई आवाज़ नहीं होती।

अनित्‍य, अनात्‍म, दु:ख।

निर्मल वर्मा।

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