Wednesday, December 28, 2011

हम आदिम ख्वाहिश का हिस्सा

हो न सके हम
छोटी सी ख्वाहिश का हिस्सा

हो न सके हम बदन उधारे बच्चों जैसा

गर्मी या बारिश का हिस्सा

हुआ न मनुवां

किसी गौर की महफिल का गायक साज़िंदा¸

अपने ही मौरूसी घर का

रहा हमेशा से कारिंदा

दास्तान हो सके न रोचक

याकि लोक में प्रचलित किस्सा

जीवन जीने की कोशिश में

लगा रहा मैं भूखा–प्यासा

होना था कविता सा¸ लेकिन

हो न सका मैं ढंग की भाषा

जनम जनम से

होता आया

इन–उन की ख्वाहिश का हिस्सा

जीवन बांध नहीं पाये हम

मंसूबे ही रहे बांधते¸

खुलकर खेल न पाये बचपन

यूं ही खिचड़ी रहे रांधते

हो न सके

जीवन जीने की

हम आदिम ख्वाहिश का हिस्सा

-स्व. नईम, देवास..

No comments: