Sunday, December 25, 2011

दिसम्बर का आखरी हफ्ता,उस रोज़ रात और भोर में फर्क करना मुश्किल हो रहा था,सड़क पर कुछ लोग,अँधेरे में खम्बों पर लगी लाइट्स,और कोहरे को चीर कर आती गाड़ियों की रौशनी से मुझे उस सुनसान सी सड़क पर चलने का हौसला मिल रहा था,शायद बर्फ पड़ने की बात सुबह ही अखबारों में पढ़ी थी,कुछ ने लिखा था पेड़ों की पत्तियों और पानी पर बर्फ की एक पतली वरक जम जायगी ,पर इन सब से बेखबर आधी रात को तुम्हारे बुलाने पर आया था,काफी देर इंतज़ार के बाद, उस पेड़ के पत्तों की ओर निगाह गयी, जिसके नीचे मै खड़ा हो कर तुम्हारे घर की ओर बड़ी हसरत भरी निगाहों से देख रहा था,उसमे किसी भी तरह की हरक़त नही हो रही थी,हाथों से छुआ, तो बर्फ उँगलियों पे आ जमी,उस बर्फ को तो उँगलियों से अलग कर दिया, पर आज भी तुम्हारा वो आखरी इंतज़ार याद आता है,पत्तियों पर तो बर्फ की वजह से उन्हें सांस लेने में दिक्कत आई, पर मुझे, तुम्हारे न आने से बहुत तकलीफ हुई.!

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