Saturday, December 3, 2011

यूं तो हर परछाईं किसी काया की परछाईं होती है, काया की मोहताज, पर कई परछाइयां ऐसी भी होती हैं, जो इस नियम के बाहर होती हैं, काया से भी स्‍वतंत्र। और यूं भी होता है कि हर परछाईं न जाने कहां से, और किस काया से टूटकर तुम्‍हारे पास आ जाती है, और तुम उस परछाई को लेकर घूमते रहते हो और खोजते रहते हो कि यह जिस काया से टूटी है वह कौन सी है ?

(अमृता प्रीतम की आत्‍मकथा से)

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