Thursday, January 24, 2013

"शर्म से कहाँ गड़ मरुँ"- -बहादुर पटेल

मित्र Bahadur Patelकी एक नायाब कविता with a Confession being a MALE

शर्म से भरा हुआ हूँ मैं आजकल
इतना ज्यादा कि कहाँ छुपाऊ अपने आपको
है कौन सी ऐसी जगह
जहाँ उतर जाँऊ दबे पाँव
कहाँ से लाऊँ ऐसे पाक साफ हाथ
जिनसे ढँक सकूँ अपना ये मलिन चेहरा

कैसे बचाऊँ अपने होने से
इस पृथ्वी के टूटते रेशों को
कौन सी कालिख होगी अपने भीतर के कलंक
नापने के लिए
आदिम नाख़ून हैं मेरे
जिन पर लगे खून के धब्बे किस पानी से धोऊँ मैं

आरोप किसी खाई से निकलना दुष्कर
कितना मुश्किल है अपने को गुनाहगार कह पाना
किसकी ओट में जाकर छिपूं मैं
हर तरफ अब मेरी अपनी आँखों में
दिखता है भेड़िये का रूप
अपने होने को कैसे नकार सकता हूँ मैं

किस किस से क्षमा मांगूंगा
कौन सी स्त्री करेगी मुझे बाइज्जत बरी
सदियों का अपराधी हूँ मैं
अपने पुरखों के अपराध भी धरो मेरे सर
मैं उफ़ तक नहीं करना चाहता
अपनी नाभि नाल को मुझसे अलग करो
मैं प्रार्थना से छलने का आदि हूँ

धरती कब तक गाओगी मेरे पैदा होने पर
मंगल गीत
धकेलो मुझे कि हर स्त्री का दोषी हूँ
गिरूँ तो कहीं जगह न मिले
आकाश न थामना मुझे
मेरी काली छाया से बचना तुम

माँ किस मुंह से पुकारूँ तुम्हे
बहिन कैसे मुंह दिखाऊँ
बेटी कैसे कहूँ तुम्हे बेटी
बताओ तुम सब कि कैसे छुपाऊँ
मैं अपने पुरुष का चेहरा
कि शर्म से कहाँ गड़ मरुँ .

-बहादुर पटेल

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