Tuesday, January 1, 2013

मुहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है - जावेद अख़तर


Pankaj Dixit के सौजन्य से पूरी नज्म.....

हमारे शौक़ की ये इंतिहा थी
क़दम रक्खा कि मंज़िल रास्ता थी

बिछड़ के डार से बन- बन फिरा वो
हिरन को अपनी कस्तूरी सज़ा थी

कभी जो ख्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी

मैं बचपन में खिलौने तोड़ता था
मिरे अंजाम की वो इब्तिदा थी

मुहब्बत मर गई मुझको भी ग़म है
मेरे अच्छे दिनों की आशना थी

जिसे छू लूं मैं वो हो जाए सोना
तुझे देखा तो जाना बददुआ थी

मरीज़े- ख्वाब को तो अब शिफ़ा है
मगर दुनिया बड़ी कड़वी दवा थी

-जावेद अख़तर

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