Tuesday, March 5, 2013

सोचना एक कष्टप्रद प्रक्रिया है



जीवन की सडकों पर सपनों के पेड़ लगे थे और पेड़ों के नीचे दुश्कालों की छाँह थी

उस घने जंगल में कोई ऐसी राह नहीं थी जो कही जाकर मिलती थी और कही से सूरज की रोशनी उस राह पर दिखती भी नहीं थी, बस सघन पेड़ों के बीच से कुछ किरणें यूँ झाँकती थी मानो तुमने कही से एक सुनसान में आवाज दे दी हो..........और एकाएक पक्षियों का कलरव गान गूँज उठा हो..........
कई दिनों के बाद मिलना ऐसा ही है जैसे अभी-अभी ख़्वाबों से जाग कर उठे और सामने पसरी ज़िंदगी को देखकर बस रो दिए !!!
लगता है इस चाँद की रोशनी में लगातार उतार चढ़ाव आने से सूरज की चमक में कई कई परतें चढ गई है जैसे किसी ने उचककर कह दिया हो ले जाओ यहाँ से अपनी तीखी रोशनी नहीं तो दो बाल्टी पानी फेंक देंगे.........और इस सबके बीच धरती तो एकदम अँधेरे में ही रही यहाँ-वहाँ से सच में देखो ज़रा इसे पलटकर.......... 


लंबे दिनों के बाद एक हल्की सी बहुत छोटी सी रात आई थी और सपनों के पंख उग आये ऐसे जैसे किसी अबाबील के सर पर उग जाये एक झंझाड
सोचा कि कहाँ से सोचूँ और फ़िर बंद कर दिया क्योकि सोचना एक कष्टप्रद प्रक्रिया है और फ़िर मिलता कुछ नहीं, टूटा तो मन था, रिश्तों में इसकी खनक क्यों सुनाई दी ?
धूप जैसे सपनों में खिली चांदनी और चलते चलते लगता है मानो एक फुहारों की गली से आहिस्ते आहिस्ते गुजरते हुए उस शिखर पर जाना है जहां कबीर ने कहा था कि सब माया है.....

नींद की खुमारी में सड़क पर चलते हुए याद ही नहीं रहा कि एक लंबा बेबस युग बीत रहा है, समय सरक रहा है, साँसों का सफर पूरा हो रहा है, स्पंदन की गति मंद पड़ गई है, नब्ज़ थमती जा रही है और जीवन कहाँ जा रहा हो- पता नहीं, जैसे एकदम सरसराता हुआ सांप निकल जाये सामने से और हम चाहकर भी पकड़ ना पायें उसे......
लौटना ठीक वैसा है जैसे गहरे नैराश्य भाव से हम असफलता की सीढियां चढते है
कोख से कब्र के सफर में चार दिन ऐसे बीत रहे है जैसे सूतक लगा हो खुशियों को छूने से.....

बहुत देर तक ताका किया उस बाट को जहां से गुजरा था एक कल, एक अतीत और कुछ अपने पल, फ़िर लगा कि आने वाला कल भी ऐसी ही किसी राह पर लटकता सा आता होगा, बस मुँह मोड दिया एकदम और छोड़ दिया ताकना-झांकना कि बस कोई कल नहीं और कोई बाट नहीं सब कुछ छोड़ देंगे.
रात अक्सर आ जाया करती है जीवन में, कभी-कभी रात में भी रात को देखना एक अजूबा ही लगता है भोर तक जाती और ज़िंदगी के हर सफे पर पसरती रात, कही रात राख की ओर तो नहीं आज ???
रात तो ऐसे गुज़री मानो छाती पर से लहराता हुआ एक सांप गुजर गया और अपनी बांबी में ले गया वो स्वप्न जो इस भोर को सुहानी भोर में बदल सकते थे.

आना तो था नहीं तुम्हें, बस एक धोखे में रखा अपने आप को और फ़िर धीरे से दरवाजा यह कहते हुए बंद कर दिया कि बस आते ही होंगे यह तो यूँही धकेल रहा हूँ, हवाएं जो चल रही है और धूल बहुत उड़ रही है, आँखों में चली जायेगी तो आंसूओं में और सच्चाई में फर्क करना मुश्किल हो जाएगा.
खोलना तो दोनों सिरे थे पर गाँठ ऐसी उलझी कि बस सारा जीवन ही निकल गया सुलझाने में और फ़िर दोनों सिरे हवा में लहराते रहे ठीक ऐसे जैसे संताप, अवसाद और तनाव के बीच साँसों का आना जाना लगा रहता हो...... 

चेहरा देखकर लगा कि वो एक गुमी हुई पोस्ट की तरह से गलत पते पर जा पहुंचा है

छोडना तो था एक नदी को, एक शहर को, एक चलते-फिरते जीवन को और क्या छोड़ आया मै वहाँ ? आज सोच रहा हूँ तो लगता है जैसे सब कुछ वही रह गया और इन सुनसान में एक पहाड़ी के नीचे चला आया, जहां से चला था - जैसा खाली हाथ, वही लौट आया हूँ खाली हाथ............. 

अब कहाँ पसारू ये हाथ जो कभी किसी के सामने नहीं पसरे, पर आज ना जाने क्यों सर झुकाकर इबादत करने को जी चाहता है कि जहां कही भी सुन लो तुम कि बस हार गया हूँ और लौट रहा हूँ मै....एकदम आधा अधूरा और खाली सा ........... 

कही से उठा था धुआँ और कही पे लगी थी आग...........ये उस सूर्ख पलाश का कहना था.......जो जंगल में एक आग फैला रहा था,

इन रिश्तों में अब कुछ नज़र आता नहीं है बस आओ छोड़ दे इन्हें और सब कुछ तिरोहित करके अपनी अपनी दुनिया में चले जाये और फ़िर कही से शुरू करें फ़िर से जीने की कवायद......
वो भीगती और सुलगती हुई यादें फ़िर से एक सिहरन पैदा कर रही है जैसे एकदम से बिजली चमके और फ़िर बारिश की कुछ मोटी-मोटी बूँदें तन मन भिगो दे.............

बहुत समेट लिया... सारी उम्र इसी में निकल गई जबकि पता था कि यही सबको छोडकर और सब कुछ छोड़ कर निकल जाना है एक अनजानी राह पर..
ये उमस भरी अलसाई सी शाम है जो एक गहरी तपी हुई दोपहर से निकल कर आई है, बस हवाओं ने भी इठलाना छोड़ रखा है मानो रूठ गई हो तुम्हारी तरह और थम गई हो साँसों की तरह.............

उनके जाने के बाद उनके कागजों को मैने लगभग एक अंधे व्यक्ति की तरह छुआ था, बिना किसी उम्मीद के, बिना यह जाने कि वह मेरे एकांत को अपने कागज-पत्रों से भर गए है...!

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