Tuesday, March 19, 2013

जूते - हेमंत देवलेकर


सर्दी की रातों में
जूता निर्जन में कोई डाक बंगला है
सुबह हमारे पैरों का फ़र्ज़ होना चाहिए
किसी के दरवाजे पर दस्तक की तरह
अपने जुते को हम हौले-हौले खटखटाएं
कड़ी सर्दी से बचने के लिए
रात भर झींगुर इसमें सोते हैं
और वे कितने बेफिक्र.

एक घर में होते हैं हज़ारों घर
उन्हें यकीन है कि ये दुनिया साझेदारी से चलती है
झींगुर इसमें सोते हैं
और उन्हें यकीन है

-हेमंत देवलेकर

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