Thursday, March 28, 2013

पाँवों में टायर की चप्पल, कंधे पर झोला, बदन पर खादी, होठो पर सिगरेट, हाथों में लाल किताब, जुबान पर अंग्रेजी, दिमाग में वासना और दिल में बदलाव का स्वप्न लिए ये लोग क्रान्ति की तलाश में आये थे यहाँ बनखेड़ी होशंगाबाद के पिछड़े इलाके में, एंट्री पॉइंट था 'शिक्षा', जी हाँ वही शिक्षा - जिसे स्वीकृती देते समय उस समय के तत्कालीन शिक्षा सचिव ने कहा था कि जितना कबाडा शिक्षा का अभी है उससे ज्यादा ये पढ़े-लिखे विदेश पलट और जेएनयु दक्ष लोग क्या करेंगे ? बस झमाझम काम शुरू हुआ था, संस्था में आने वालीयों को स्थानीय लोंढे भी जब निपटाने लगे तो मामला गडबड होने लगा. (मेरी एक कहानी का अंश)

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