Friday, April 15, 2011

एनजीओ पुराण भाग ४४ समाप्त

वो और ये एक ही दूकान पर थे, प्रेम होना स्वाभाविक था बस धीरे धीरे पींगे बढ़ी और इश्क ने अपना पूरा चक्र समाप्त किया, शादी तो कर ली पर ना जमाने से ना घर से स्वीकृती मिली बस एक एसडीएम को खुश करके एक कागज़ का टुकड़ा ले लिया, फिर क्या था शहर बदला दूकान बदली . यही तो है दूकान में काम करने का फ़ायदा सारे नफे नुकसान एक तरफ और समाज सेवा एक तरफ(एनजीओ पुराण भाग ४४ समाप्त)

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