Tuesday, April 14, 2015

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उदास मौसम के खिलाफ कड़ी धूप की प्रतीक्षा।

बाबा साहब को जिस तरह से हम सबने इस्तेमाल करने लायक बना लिया है और चौराहों से लेकर संसद जैसे जगहों पर मूर्तियाँ लगा ली है, घरों में (वो भी सिर्फ दलितों के) फोटो लगा लिए है, और इसके बरक्स जो आंबेडकर का "योगदान" सिर्फ आरक्षण तक सीमित रह गया है क्या वह चिंतनीय नहीं है, जिस जाति को बदलने की बात वो कर रहे थे, खत्म करना चाहते थे, सामाजिक विषमता को ख़त्म करना चाहते थे, उसे भी तो हमने कही खो दिया और महू जैसे बड़े बड़े मठ बनाकर रख दिए, आम्बेडकर संस्थान को विवि बना देने से काश जाति या भेदभाव ख़त्म हो जाता या तमाम आंबेडकर पीठ पर बैठे बौद्धिक विलास में व्यस्त और त्रस्त लोग .खैर.........बाबा साहब को अब कम से कम बख्श कर हमें कुछ नया सोचना चाहिए क्योकि यह वह हिन्दुस्तान नहीं जो वो देखना चाहते थे, ना ये वो देश है जिसमे रहकर उन्होंने कड़े श्रम से पढाई की, बाहर गए - वजीफे पर और संविधान जैसा पवित्र ग्रन्थ रचा. मायावती और मुलायम अगर उनके वंशज बन गए तो हो गया कल्याण फिर........बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी........बहरहाल मुझे लगता है सम्पूर्ण दलित आन्दोलनकारियों, सामाजिक विषमता के बहाने करोड़ों डकार जाने वाले बुद्धिजीवियों और विश्व विद्यालयों में, संस्थाओं और शासन प्रशासन में आरक्षण की बैसाखी लेकर अपने कुत्सित विचारों को परिणिति तक पहुंचाने के लिए आसीन लोगों को बाहर किये बिना असली दलित उत्थान संभव नहीं है. बंद करिए आंबेडकर वाद और ढकोसले और आरक्षण और बाबा साहब को बाबा साहब रहने दीजिये और उन्हें सिर्फ एक प्रखर सामाजिक क्रान्ति का प्रवर्तक बना रहने दीजिये और अगर सच में कुछ उनके नाम पर करने का संकल्प लेना चाहते है तो उस समता मूलक समाज की बात कीजिये, संविधान की बात कीजिये, कर्तव्य और अधिकारों की बात कीजिये और दलितों के नाम पर दलितों की और दलितों के लिए घटिया कमीनी राजनीती करना बंद कीजिये. और ठीक इसके साथ इन पढ़े लिखे दलितों को, जो उच्च ज्ञान डिग्री और पी एच डी हासिल करने या प्रमुख सचिव स्तर पर जाकर भी दिमागी रूप से गुलामी सहते या दलित बने रहते है, को भी यह समझना चाहिए कि उनके दलितों का उद्धार सिर्फ आरक्षण नहीं करेगा क्योकि अब यह सब लम्बे समय तक नहीं चलने वाला है एक आग और बगावत जन्म ले चुकी है और जिस तरह से समाज साम्प्रदायिक रूप से बाँट दिया गया है और शहरी - ग्रामीण, अमीर - गरीब नई जातियां है, उसकी आग से कोई बच नहीं पायेगा और अब बाबा साहब, गांधी, मार्क्स या चे ग्वेरा या बुद्ध - महावीर या राम - रावण भी कुछ बिगाड़ नहीं सकेंगे किसी का, समय गुजर गया है, अब नई चिंताएं है और नए सन्दर्भ, नई लड़ाईयां है और नए प्रसंग ....



थोड़ी मेहनत लगेगी पर मजा आ जाएगा।
बहुत सस्ता है ताजा पुदीना, साफ़ कर धोकर और फिर दो तीन दिन में सुखा लें छाँव में और फिर सब्जी, दाल, छाछ ,पास्ता, नींबू चाय, ग्रीन टी, नूडल्स या कही भी इस्तेमाल कर सकते है इन पत्तियों का।
क्या स्वर्गिक सुवास और अदभुत स्वाद।
चलिए, आज ले लो और बैठ जाओ बस आधा घंटा।




मेरे भाई का निधन हुए सात माह हो गए सरकारी नियमों के अनुसार उसकी पत्नी को अनुकम्पा नियुक्ति मिलना थी परन्तु शिवराज सरकार के भ्रष्ट और निकम्मे प्रशासन शासन में अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई. मैंने 6 दिसंबर को मुख्य मंत्री हेल्प लाइन पर शिकायत दर्ज करवाई थी परन्तु आज तक बार बार फालो अप करने पर भी कुछ नहीं हुआ. मुख्य सचिव से लेकर प्रमुख सचिव तक को पत्र लिखा परन्तु ढाक के तीन पांत. आखिर 26 फरवरी को राष्ट्रपति के यहाँ शिकायत दर्ज करवाई वहा से 18 मार्च को शिकायत पर तुरंत कार्यवाही करने हेतु मप्र शासन को निर्देशित किया गया परन्तु यहाँ भी कुछ हाल कम नहीं. जब मैंने अप्रेल में भोपाल फोन करके सम्बंधित अधिकारी से पूछा तो बोले देखता हूँ जिलाधीश को भिजवा दूंगा फिर उन्होंने जिलाधीश को प्रकरण भेज दिया यानी कुल मिलाकर बात फिर वही हो गयी. मप्र के शिक्षा विभाग जैसा भ्रष्ट विभाग नहीं और मप्र शासन जैसा मक्कार प्रशासन नहीं और पुरे प्रदेश को बेवकूफ बनाने वाली मुख्यमंत्री हेल्प लाइन नहीं, जिस शिकायत को दसियों बार लेवल चार पर ले जाया गया जिसकी समीक्षा स्वयं मुख्य मंत्री करते है फिर भी नियमों के तहत नियुक्ति नहीं मिल पा रही तो काहे का सुशासन और काहे के जन प्रतिनिधि. सारे अफसरों से सिर्फ हफ्ता वसूल कर व्यापम घोटाले करने में दक्ष पुरी टीम को लोगों की मृत कर्मचारियों के परिवारों की चिंता कहाँ है? इतनी बेशर्मी है कि मैंने कम से कम पचास मेल, पंजीकृत डाक से आवेदन, और स्पीड पोस्ट से मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा , प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग और स्वयं शिवराज सिंह चौहान को लिखा, स्कूल शिक्षा मंत्री को लिखा परन्तु  कही से  एक जवाब भी नहीं आया इतनी घोर अशिष्ट सरकार और लापरवाह प्रशासन है. 

बंद कर दो मुख्य मंत्री हेल्प लाइन का फर्जीवाड़ा और अपव्यय, राज्यपाल को लिखने से मतलब नहीं है वे स्वयं मुख्य मंत्री के जाल में फंसे है. मप्र में इतना लापरवाह प्रशासन कभी नहीं था, अब मुझे लगता है कि मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और आयुक्त लोक शिक्षण, जिलाधीश और जिला शिक्षा अधिकारी को पार्टी बनाकर सुप्रीम कोर्ट में ही सीधे याचिका दायर करूँ......... पत्रकार मित्रों को टेग इसलिए कर रहा हूँ कि क्या आप लोग कभी मृत कर्मचारियों की कोई स्टोरी प्लान कर सकते है मामा राज में, मेरी जानकारी में 350 प्रकरण अकेले स्कूल शिक्षा विभाग में लंबित है सन 2009 से और शिवराज जी जो बडबोले बनते है और शहीदों के घर से लेकर तमाम घरों में घूमते है मातम पुरसी करते है, को इन कर्मचारियों के परिवारों की चिंता है कि ये कैसे गुजर बसर कर रहे है मप्र में ??? 


Pankaj Shukla​ Deepak Rai​ Brajesh Rajput​ Shiv Anurag Pateriya​  Uday Aras​ Navin Rangiyal​ Pushpendra Vaidya​ Sourabh Khandelwal​ Piyush Babele​ Swatantra Mishra​ Om Thanvi​  Pallavi Vaghela​  Sneha Khare​  Rahul Chouksey​

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