Monday, April 13, 2015

जो कहा जाना चाहिए- गुंटर ग्रास नहीं रहे. 13 April 15

गुंटर ग्रास नहीं रहे. पर जो कह गए वो है, प्रासंगिक है, ज़रूरी है. इस कवि को नमन करते हुए उनकी एक कविता--


जो कहा जाना चाहिए

मैं चुप क्यों रहा, क्यों छुपाता रहा इतने लंबे समय तक
वह खुला राज़
जिसे बरता गया बार-बार जंगी मैदानों में, और
जिसके अंत में जो बचे हम
तो हाशिये से ज्याबदा कुछ भी नहीं थी हैसियत हमारी.

ज़ोर-ज़ोर से चीख कर
उन्होंने खड़ा कर दिया एक उत्सीव सा कुछ
जिसमें दब गई ये बात, कि
यह पहले हमला करने का कथित अधिकार ही है
जो मिटा सकता है ईरानी जनता को-
क्योंकि उनकी सत्ता का दायरा फैला है
एक न्यू क्लियर बम बनने की आशंकाओं के बीच
वे मानते हैं कि ऐसा कुछ ज़रूर हो रहा है.

बावजूद इसके, क्यों रोके रहा खुद को मैं
उस दूसरे देश का नाम लेने से
जहां बरसों से, भले गुपचुप
न्यूक्लियर आकांक्षाओं की तन रही थी मुट्ठी अदृश्य
क्योंकि उस पर किसी का ज़ोर, कोई जांच कारगर नहीं?

इन बातों को छुपाया गया दुनिया भर में
जिसमें शामिल थी मेरी चुप्पी भी-
जब्र तले एक झूठ की मानिंद-
जिसे सज़ा मिलनी ही चाहिए
बल्कि सज़ा मुकर्रर थी, बशर्ते इस चुप्पी को हम तोड़ते.
यहूदी विरोध के फतवे से तो आप वाकि़फ़ होंगे.

अब, चूंकि मेरा देश
जो एक नहीं, कई बार रहा साक्षी खुद अपने अपराधों का-
(और इसमें इसका कोई जोड़ नहीं)
बदले में यदि विशुद्ध व्या़वसायिक नज़रिये से ही
विनम्र होठों से इसे करार देकर प्रायश्चित
इज़रायल को न्यूक्लियर पनडुब्बी भेजने का करता हो एलान
जिसकी खूबी महज़ इतनी है
कि वह दाग सकती है तमाम विनाशक मिसाइलें वहां
जहां एक भी एटम बम का वजूद अब तक नहीं हुआ साबित
लेकिन डर, ऐसा ही मानने पर करता है मजबूर बासबूत
तो कह डालूंगा मैं वो बात
जो अब कही जानी चाहिए.

लेकिन अब तक मैं खामोश क्यों रहा?
इसलिए, क्यों कि मेरी पैदाइश की धरती
जिस पर जमे हैं कभी न मिटने वाले कुछ दाग
रोकती थी मुझे कहने से वो सच
इज़रायल नाम के उस राष्ट्र से, जिससे बिंधा था मैं
और अब भी चाहता ही हूं बिंधे रहना.

फिर आज क्या हो गया ऐसा
कि सूखती दवात और बुढ़ाती कलम से
मैं कह रहा हूं ये बात
कि न्यूक्लियर पावर इज़रायल से
इस नाज़ुक दुनिया के अमन-चैन को खतरा है?

क्योंकि यह कहा ही जाना चाहिए
कल, हो सकता है बहुत देर हो जाए;
और इसलिए भी, कि उसका बोझ लादे हम जर्मन
ना बन जाएं कहीं ऐसे किसी अपराध के भागी
जो न दिखता हो, न ही मुमकिन हो जिसका प्रायश्चित्त
पुराने परिचित बहानों और दलीलों से.

लिहाज़ा, तोड़ दी है अपनी चुप्पी मैंने
क्योंकि थक गया हूं मैं पश्चिम के दोगलेपन से;
इसके अलावा, एक उम्मीद तो है ही
कि मेरी आवाज़ तोड़ सकेगी चुप्पी की तमाम जंज़ीरों को
और आसन्न खतरा बरपाने वालों के लिए होगी एक अपील भी
कि वे हिंसा छोड़, ज़ोर दें इस बात पर
कि इज़रायल की न्यूक्लियर सामर्थ्य और ईरान के ठिकानों पर-
दोनों देशों की सरकारों को मान्य एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी
की रहे निगरानी
स्थायी और अबाधित.

एक यही तरीका है
कि सभी इज़रायली और फलस्तीनी
यहां तक कि, दुनिया के इस हिस्से में फैली सनक के बंदी
तमाम लोग
रह सकें साथ मिल-जुलकर
दुश्मनों के बीच
और ज़ाहिर है, हम भी
जिन्होंने अब खोल दी है अपनी ज़बान.


(अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव, साभार- जनपथ डॉट कॉम)

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