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श्रद्धांजली ..शहरयार साहब को...अलविदा शहरयार, आप बहुत याद आएंगे...

मेरे लिए रात ने
आज फ़राहम किया
एक नया मर्हला ।

नींदों ने ख़ाली किया

अश्कों से फ़िर भर दिया
कासा: मेरी आँख का
और कहा कान में

मैंने हर एक जुर्म से
तुमको बरी कर दिया
मैंने सदा के लिए
तुमको रिहा कर दिया

जाओ जिधर चाहो तुम
जागो कि सो जाओ तुम
ख़्वाब का दर बंद है

II

सूरज का सफ़र ख़त्म हुआ रात न आयी
हिस्से में मेरे ख़्वाबों की सौग़ात न आयी

मौसम ही पे हम करते रहे तब्सरा ता देर
दिल जिस से दुखे ऐसी कोई बात न आयी

यूं डोरे को हम वक्त की पकड़े तो हुए थे
एक बार मगर छूटी तो फिर हाथ न आयी

हमराह कोई और न आया तो क्या गिला
परछाई भी जब मेरी मेरे साथ न आयी

हर सिम्त नज़र आती हैं बेफ़स्ल ज़मीनें
इस साल भी शहर में बरसात न आयी
बुला रहा है कौन मुझको चिलमनों के उस तरफ
मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है...
ये किस मकाम पर हयात मुझको लेकर आ गयी
ना बस खुशी पर है यहां ना गम पर इख्तियार है

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