जिंदगी की दौड़ में इतने लोग मिलते है कि सबके बारे में हम कभी याद नहीं रख पाते,बस यही सोचकर क्यों ना सिलसिलेवार सब बातों को लिखता रहूँ ताकि सब इसमे दर्ज हो जाए उनके बारे में जो कभी जीवन में आये टकराए और बगैर आवाज किये चुपचाप लौट गए-कब कहा नहीं पता पर उनकी बेचैनी साँसों का स्पंदन अभी तक गूंजता है मेरे भीतर लगता है कि सब कह रहे हो रास्ता किधर है शब्द उतर आते है कागज़ पर, एकाकार हो जाता हूँ उन भावनाओं और उन कोमल तंतुओं के साथ जो इंसान होने को परिभाषित करता है
Wednesday, February 1, 2012
अपने पीतल के डिब्बों के साथ इमली रगडते हुए
अभी बाजार गया था पता नही क्या- क्या उठा लाया.............याद आया बचपन- जब पिताजी रसोई में एक लंबे से ऊँचे स्टूल पर बैठते थे और माँ एक- एक डिब्बा खोलकर बताती थी कि क्या खत्म और क्या लाना है, मसलन इस माह में प्रदोष और शिवरात्री है साथ ही संतोषी माँ के चार उपवास तो साबूदाना और मूंगफली के दाने दो-तीन किलो लाने होंगे ....नवरात्री है सो मेहमान आयेंगे, इस तरह से पूरी लिस्ट बनती और माह के पहले रविवार को हम तीनों भाई पिताजी के साथ बाजार जाते, बनिए को लिस्ट थमाते, कटिंग बनवाते और लौटते समय पिताजी के साथ बनिए के यहाँ से सामान और चतरू मामा के यहाँ से गरमा- गर्म जलेबीयाँ लेकर लौटते !!! क्या दिन थे फ़िर घर आकर माँ के साथ सामान भरवाने में मदद, दीवाली पर उन पीतल के डिब्बों की चमक आज भी अँधेरे में कौंध जाती है, माँ के साथ हम इमली को घिस घिस कर रगडते थे, और अपनी मेहनत साल भर उन डिब्बों पर दमकती रहती थी. आज ना घर है, ना माँ- बाप, हाँ बड़ा बाजार है. वो पीतल के डिब्बे भी माँ के साथ गायब हो गए, कहा पता नहीं??? आज हम बाजार जाते है तो पूछते है कि ये क्या है, और इसका क्या होता है या इसे कैसे बनाते है और रंग बिरंगी चमचमाती पन्नियों में लिपटी सामग्री उठा लाते है और घर में वो महीनों पडी रहती है युही, फ़िर जैसे- तैसे उसे बना कर अपने पेट में कचरा इकठ्ठा करते है.........कहा है वो बनियों की दुकाने, कहा है पीतल के डिब्बे और माँ-बाप जिन्होंने सिखाया था कि "उतना ही सामान लेना जितना इस्तेमाल कर सकते हो, बाजार भाग थोड़े ही रहा है कही......" पर मै, तुम, हम, सब एक के साथ एक फ्री के चक्कर में घर में इतना सामान ले आये है कि अपने रहने की ही जगह बची नहीं है, फ़िर रिश्ते, भावनाएं और संबंधों के लिए जगह कहा बचेगी और दोस्त- यार- रिश्तेदार इसलिए दूर हो गए .....पता नहीं मै आज फ़िर से उसी देवास के बाजार में जाना चाहता हूँ एक रविवार को फुर्सत से, और लौटते हुए जलेबी लाकर इत्मीनान से खाना चाहता हूँ , अपने पीतल के डिब्बों के साथ इमली रगडते हुए......और उस चमक को आज खोते हुए समय में फ़िर से अपने भीतर जगाना चाहता हूँ.......
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment