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वीस्‍वावा शिम्‍बोर्स्‍का- नमन : गीत चतुर्वेदी.


Wisława Szymborska वीस्‍वावा शिम्‍बोर्स्‍का नहीं रहीं. कल शाम ही उनकी प्रतिनिधि कविताएं पढ़ रहा था. कल ही एक मित्र से उनके बारे में चर्चा हो रही थी. जिस समय हम उनके बारे में बातें कर रहे थे, उस समय बाहरी हवा लगभग आखि़री बार उनके भीतर प्रविष्‍ट हो रही थी, वह लगभग आखि़री बार उस हवा में अपने भीतर का भ्रमण प्रवाहित कर रही थीं.

शिम्‍बोर्स्‍का उन कवियों में हैं, जिन्‍हें मैंने अपने शुरूआती दिनों से ही पढ़ना शुरू किया था. जब मैंने किताबों की दुनिया में आंखें पूरी खोलीं, तब वह पहली नोबेल लॉरिएट थीं. मुझे याद है, 1996 में 'टाइम्‍स ऑफ़ इंडिया' में नोबेल पुरस्‍कार की ख़बर उनकी श्‍वेत-श्‍याम तस्‍वीर के साथ छपी थी. पहली नज़र उनके चेहरे की बुज़ुर्ग सुंदरता पर टिकी थी और अगले कई दिनों तक उनका नाम सही उच्‍चारण कर सकने में ज़ुबान की कसरत हुई थी. उसके कुछ समय बाद ही उनका नोबेल लेक्‍चर पढ़ा था, जो एक कवि के अंतर्लोक का अत्‍यंत सुंदर व सहज बयान है. शिम्‍बोर्स्‍का उसके बाद मेरी कविता और भावलोक के अनिवार्य अवयव ही तरह रहीं. वह अब भी रहेंगी.

शिम्‍बोर्स्‍का उन दुर्लभ महिलाओं में थीं, जिनकी कविता सिर्फ़ उनके स्‍त्री होने तक सीमित नहीं थीं. वह जेंडर की सीमा से बाहर एक मनुष्‍य थीं. इसीलिए उनके यहां जीवन और लोग की विविध छवियां बिना किसी परदे या आवरण के आते हैं. वह अनावृत्‍त जीवन की गायिका थीं. राजनीति और भावनात्‍मक राजनीति उनकी कविताओं का कपास थे. वह हमेशा ख़ुद को ग़ैर-राजनीतिक कवि कहती थीं और यह भी उन्‍हीं का बयान है कि ग़ैर-राजनीतिक होना भी सक्रिय राजनीति में हिस्‍सेदारी है. हमारी भाषा के जो लोग कवि की राजनीतिक चेतना पर सवाल करते हुए अक्‍सर दांत के अन्‍न-कण-अवशेष कुरेदते हैं, उन्‍हें आंख खोलकर शिम्‍बोर्स्‍का की कविताएं व गद्य ज़रूर पढ़ना चाहिए.

पोलैंड में उनकी कविताओं की किताब वैसे ही बिकती हैं, जैसे उपन्‍यास. वह लोगों की प्रिय रहीं. लेकिन नोबेल पाने तक वह बाहरी दुनिया के लिए लगभग अनजानी रहीं. शुरुआती दिनों में चेस्‍वाव मीवोश ने उनकी कई कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवाद किया था. उन्‍हें नोबेल मिलने पर न ख़ुद वह चौंक गई थीं (वह घोषणा सुनकर वह बीमार हो गई थीं), बल्कि पोलैंड के बुद्धिजीवी भी सदमे में थे. कई लोगों ने उन्‍हें अयोग्‍य कहा था, लेकिन उसके बाद शिम्‍बोर्स्‍का दुनिया की लगभग हर भाषा में पहुंचीं और हर जगह मक़बूल हुईं.

उनकी कविताएं इस समय बेहद याद आ रही हैं. संवाद प्रकाशन, मेरठ से विजय अहलुवालिया के सुंदर अनुवाद में 'बीतती सदी में' प्रकाशित है. इंटरनेट पर हिंदी में उनकी कई कविताएं उपलब्‍ध हैं. यहां उनकी चर्चित कविता 'बायोडाटा लिखना', अशोक पांडे के अनुवाद में--

बायोडाटा लिखना
____________

क्या किया जाना है ?
आवेदनपत्र भरो
और नत्थी करो बायोडाटा

जीवन कितना भी बड़ा हो
बायोडाटा छोटे ही अच्छे माने जाते हैं.

स्पष्ट, बढ़िया, चुनिन्दा तथ्यों को लिखने का रिवाज है
लैंडस्केपों की जगह ले लेते हैं पते
लड़खड़ाती स्मृति ने रास्ता बनाना होता है ठोस तारीख़ों के लिए.

अपने सारे प्रेमों में से सिर्फ़ विवाह का ज़िक्र करो
और अपने बच्चों में से सिर्फ़ उनका जो पैदा हुए

तुम्हें कौन जानता है
यह अधिक महत्वपूर्ण है बजाए इस के कि तुम किसे जानते हो.
यात्राएं बस वे जो विदेशों में की गई हों
सदस्यताएं कौन सी, मगर किसलिए - यह नहीं
प्राप्त सम्मानों की सूची, पर ये नहीं कि वे कैसे अर्जित किए गए.

लिखो, इस तरह जैसे तुमने अपने आप से कभी बातें नहीं कीं
और अपने आप को ख़ुद से रखा हाथ भर दूर.

अपने कुत्तों, बिल्लियों, चिड़ियों,
धूलभरी निशानियों, दोस्तों, और सपनों को अनदेखा करो.

क़ीमत, वह फ़ालतू है
और शीर्षक भी
अब देखा जाए भीतर है क्या
उसके जूते का साइज़
यह नहीं कि वह किस तरफ़ जा रहा है-
वह जिसे तुम मैं कह देते हो
और साथ में एक तस्वीर जिसमें दिख रहा हो कान
- उसका आकार महत्वपूर्ण है, वह नहीं जो उसे सुनाई देता है.
और सुनने को है भी क्या ?
-फ़क़त
काग़ज़ चिन्दी करने वाली मशीनों की खटरपटर.

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