Tuesday, April 9, 2013

पिता तुम बहुत याद आ रहे हो.........इस कड़ी होती जा रही धूप में...


माँ बताती थी कि पिताजी की पहली सरकारी नौकरी छैगांव माखन में लगी थी...........वैसे तो साठ रूपये माहवार पर सिंधिया स्टेट में गये थे मास्टर बनकर क्योकि मेट्रिक के बाद नौकरी करना जरूरी था, पर वे जल्द ही छोड़कर आ गये थे, मुरार और लश्कर में हालात ठीक नहीं थे उन दिनों. यह सरकारी नौकरी थी और नब्बे ढाई सौ के वेतनमान में वे महू से खंडवा जाते और फ़िर खंडवा से सायकल लेक छैगांव माखन तक. आज यह गाँव कितना बदल गया है एक तरह से कहूँ तो हाई वे है और सारी सुविधाओं से लैस पर क्या बदला है यहाँ ? मै खोज रहा हूँ कि कोई तो स्मृति मिल जाये मेरे पिता की, कोई तो गंध मुझे मिल जाये, मै समझना चाहता हूँ  कि कैसे घर से दूर रहकर किन अभावों में वे यहाँ रहे होंगे, कैसे जीते होंगे, क्या खाते होंगे, यह जो चकाचौंध जो आज है वो उस समय तो नहीं थी, सिर्फ पूर्वी निमाड की तेज झुलसने वाली गर्मी और पानी का अकाल, कपास और लाल मिर्च की खेती, बेहद पिछडापन और अल्प वेतन.......घर आने में वो छः माह लगा देते थे, माँ कहती थी कि सारा वेतन दादी को देकर अपने लिए चंद रूपये रख लेते थे एक समय का खाना और जी तोड़ मेहनत करके जीवन जीने का उपक्रम करते थे. इसी छैगांव माखन में मेरे पिता की स्मृतियाँ है.........मै खोज रहा हूँ यहाँ -वहाँ पर कोई गंध मुझे भाती नहीं है, कोई ऐसा शख्स नजर नहीं आता जो मुझे साठ के दशक की कोई भी बात सकें, मै पागलों की तरह से गली-गली घूम रहा हूँ, खोज रहा हूँ एक भला मानुष जो किसी किस्सागो की तरह से उस जमाने की याद दिला दें उन यादों के गलियारों से मै चुनना चाहता हूँ वो सब जो मुझे पिता के संघर्ष की एक बानगी दे दें, मै आज यहाँ से जब गुजर रहा हूँ तो सुस्ता रहा हूँ - एक झीनी- झीनी छाँह में जो मुझे कही से पिता की याद दिलाती है, मै आज पिता बनकर उस संघर्ष को जीना चाहता हूँ, मै समझना चाहता हूँ कि दुर्दैव  के दिन क्या होते है, कैसे जीवन अभावों में पलता है और किन अच्छे दिनों की आशा में हम अपना सबसे महत्वपूर्ण समय गंवा देते है और कैसे संघर्ष में घिसकर हम एक बेहतरीन इंसान होने की  ओर तिल - तिल बढ़ते है........ इस पूरी लडाए के मायने क्या है, क्या संघर्ष कभी सफल होते है..........??? यह पूर्वी निमाड का सूरज आज भी उतना ही तप रहा है, आम के पेड़ों पर कही बौर नजर नहीं आते, पानी की एक बूँद के लिए आज भी मारम्मार है और शायद दूर कही किसी कोने में बैठा आदमी मुझे एहसास दिला रहा है कि वो शायद मेरे पिता के मानिंद ही है जो कड़ी धूप में माथे पर सिलवटों का पसीना पोछता हुआ एक बार फ़िर से पूरी ताकत लगाकर खडा होता है....... चल देता है........ ठीक सूरज के सामने मुँह करके, पुरे जमाने को मानो फ़िर से आज परास्त कर देगा और बचा लेगा अपने बच्चों के लिए एक दुनिया.............मै उसका पीछा कर रहा हूँ देखना है कि यह आज क्या बचा पायेगा.....पिता तुम बहुत याद आ रहे हो.........इस कड़ी होती जा रही धूप में...
— in Khandwa, Madhya Pradesh.

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