Sunday, April 21, 2013

'जो घर जाले आपना चले हमारे साथ' - प्रहलाद सिंह टिपानिया के कबीर भजन और नया रचने की जरुरत.

मालवा के देवास का संगीत से बहुत गहरा नाता है इस देवास के मंच पर शायद ही कोई ऐसा लोकप्रिय कलाकार ना होगा जिसने प्रस्तुति ना दी हो. और जब बात आती है लोक शैली के गायन की तो कबीर का नाम जाने अनजाने मे उठ ही जाता है. यह सिर्फ कबीर का प्रताप नहीं बल्कि गाने की शैली, यहाँ की हवा, मौसम, पानी और संस्कारों की एक परम्परा है, जो सदियों से यहाँ निभाई जा रही है. गाँव गाँव मे कबीर भजन मंडलियां है इसमे वो लोग है जो दिन भर मेहनत करते है- खेतों मे, खलिहानों मे और फ़िर रात मे भोजन करके आपस मे बैठकर सत्संग करते है और एक छोटी सी ढोलकी और एक तम्बूरे पर कबीर के भजन गाये जाते है. किसी भी दूर गाँव मे निकल जाईये यह रात का दृश्य आपको अमूमन आपको हर जगह दिख ही जाएगा. इन्ही मालवी लोगों ने इस कबीर को ज़िंदा रखा है और आज तक, तमाम बाजारवाद और दबावों के बावजूद भजन गायकी की इस परम्परा को जीवित रखा है शाश्वत रखा है आम लोगों ने जिनका शास्त्रीयता के कृत्रिमपन से कोई लेना देना नहीं है. 

प्रहलाद टिपानिया ऐसे ही लोक गायकों की शैली मे आते है जब वे तम्बूरे से तार को झंकृत करते है तो आत्मा का पोर-पोर बज उठता है. वे जब कबीर को गाते है तो मंच पर उनकी सादगी और मंडली के लोगों को देखकर लगता है कि यही वो कबीर है जो मिट्टी मे, मेहनत मे, पसीने मे रच-बसकर अपने जीवन के आरोह-अवरोह को भजनों की माला मे गूंथकर सबके सामने गा रहा है. पूरी भजन मंडली एकदम सादगी से गाती-बजाती है 'तेरा मेरा मनवा कैसे एक होए रे'. प्रहलाद जी शायद हिन्दुस्तानी लोकशैली मे बिरले ही गायक होंगे जो एकदम मिट्टी से जुड़े है. कल कैलाश सोनी कह रहे थे कि उनके पास ऐसी तस्वीरें है जिसमे ये प्रहलाद जी खेत मे काम कर रहे है, पढ़ा रहे है, लोगों के हुजूम के बीच समस्याएं सुनकर सुलझाने का प्रयास कर रहे है और कुल मिलाकर यह कि बहुत ही सादगी से एक सामान्य जीवन जीते हुआ गोयाकि कबीर बनकर यह राग कबीर गा रहे है. प्रहलाद जी के यहाँ कोई शास्त्रीयता का आडम्बर नहीं है, रागों की खेंच नहीं, ना ही कोमल, मध्य या निषाद का आग्रह है. कोई सुर बेसुरा नहीं और कही विलंबित ताल नहीं, न ही वो चुटकी है जो उन्हें ओरों से अलग करती हो, ना ही वो बनावटीपन है जो उन्हें विशिष्ट की श्रेणी मे लाने का भरोसा दिलाता हो. उनके श्रोता कही से किसी बुद्धिजीवी वर्ग से नहीं आते, ना ही एक उच्च समाज का गल्प दर्शाते है, ना ही उनके यहाँ कोई लंबी फौज है अनुकरणकर्ताओं की, ना ही वो ऐसी कोई महत्व्कांक्षा भी रखते है. वे किसी अंग्रेजी  अखबार के पेज थ्री पर दिखाई देते है ना ही किसी संस्कृति भवन के गलियारों की गप्प या शिगूफों मे वे शामिल है. प्रहलाद जी सिर्फ है तो अपने लोगों मे जो सिर्फ मेहनत मजूरी करके जीवन की हकीकतों से दो चार हो रहे है, वे कबीर की उस कुल परम्परा के वाहक है जो सीधे सच्चे शब्दों मे, बगैर लाग लपेट के कहते है 'इस घट अंतर बाग बगीचे इसी मे पालनहार' या धीरे से कहते है 'जिन जोड़ी तिन तोडी'.  

 यद्यपि अब उनके गायन मे एक दुहराव जरुर है, नया ना करने की, कुछ नया ना रच पाने की बेबसी, जरुर इन दिनों उनके गायन मे झलकने लगी है. स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका की प्रो. लिंडा हैस के शोध और अनुवाद या शबनम वीरमानी की फिल्मों से लेकर इधर कबीर पर हुए तमाम शोधों और देश भर के लोककला उत्सवों मे भागीदारी से उनकी सक्रीय ऊर्जा का ह्रास हुआ है, या मित्रों के दुराग्रहों पर गायन से उनके काम मे थोड़ी सुस्ती आई है, यह मानना पडेगा पर फ़िर भी वे मालवा के एकमात्र ऐसे गायक है जिहोने सभी चुनौतियों को स्वीकार करके शास्त्रीयता को एक सिरे से नकार कर वे आज भी कबीर गायन के सबसे लोकप्रिय गायक और आम लोगों मे सर्वश्रेष्ठ सहज गायक बने हुए है. यह सहजपन उनकी अपनत्व की भावना, लोगों से मिलने और जुड़ जाने की प्रक्रिया से लेकर कबीर को गाते हुए नए सन्दर्भ और मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप टीका करने से उत्पन्न हुई है. यह दर्शाता है कि एक लोक गायक जब जन से जुडता है तो वह देश काल से परे होकर गायन करता है और शास्त्रीयता का  छद्म आडम्बर छोडकर यही जनमानस भी उसे अपने गले लगाता है. 


कबीर जिन लोगों के लिए जिस भाषा मे और जिस सहजपन से दो टूक बात कहते है या टिप्पणी करते है या व्यवस्था का मखौल उड़ाकर आँखें खोलते है, वह इसी तरह से स्थापित किया जा सकता है जैसे प्रहलाद जी करते है या गाते है. अब समय है कि प्रहलाद टिपानिया नया रचे और इस समाज मे नित नई उठ रही समस्याओं को कबीर ने चौदहवी सदी मे जिस तरह से महसूस करके लिखा था; अब उसी सबको वे जनमानस के सामने रखे और बगैर किसी लाग लपेट के और सांगीतिक शास्त्रीयता की परवाह किये बिना अपने कबीर को अपने लोगों के बीच फ़िर से प्रचलित करें क्योकि अब समय कहाँ है, स्थितियां दुश्वार होती जा रही है और लोग आडम्बर मे, ढकोसलों मे और अपने 'इगो' को पुष्ट करते हुए नया रच रहे है. बेहतर है इस सबसे उबरकर कुछ ऐसा करें कि फ़िर जीवित हो कबीर और फ़िर पुरे दम से कहें 'जो घर जाले आपना चले हमारे साथ'.

No comments: