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उधेड़बुन ख़्वाबों की...............


तार पर टंगे हुए कपडे रात भर से खामोशी से मुझे घूर रहे थे, टेबल पर किताबें, हवा करता पंखा, कोने में पड़े हुए जूते, मेज पर पडी ढेर सारी चीजें मुझे घूरती रही पूरी रात और मै अलमस्त सोया रहा सोचा भी नहीं कि इतनी सारी चीजें कमरें में है और मै.....इन सबसे दूर रहकर एक अनोखे दृश्य में सपनों की दुनिया बुन रहा था........जहां सिर्फ मै था और तुम थे और एक जहान था........सिर्फ स्वप्नों का जहान..........
ये सूरज की तपती हुई धूप है या किसी ने दरवाजा खोल दिया है एकदम से...... सारी रोशनी की चकाचौंध झक्क से अंदर आ गई है...मेरे भीतर, झाँकता हूँ तो दिखता नहीं मेरा स्व जो कही गुम हो गया है इस तेज उजास में...... और मै खोज रहा हूँ एक छाँह को जो तुमसे मिलकर बनती थी मेरे भीतर .......जो मेरी पुतलियों के पीछे कही खो गई है ......रोको, अरे रोको इस उजास को..... यह घुसती चली आ रही है भीतर और भीतर..... ठीक तुम्हारी स्मृतियों की तरह से मेरे भीतर ......और देखों ना इसने आत्मा के पोर तक को जला दिया है.......आज अभी इस क्षण भंगुर होने में....

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