Thursday, April 25, 2013

पूछा तो मैंने भी अपने आप से कि क्या रखा है

पूछा तो मैंने भी अपने आप से कि क्या रखा है इन दरों-दीवार और चौखटों मे, पर ना जाने क्यों ठहर सा गया एक पल, सिहर गया, और ना जाने कौन कौन से लम्हें याद आ गये और लगा कि सारा जहाँ जरुर मेरा है, पर यह कोना सिर्फ और सिर्फ मेरा है जहाँ मै बेफिक्र हूँ और एकदम मुक्त.........और फ़िर तुम्हारी सारी यादें तो यहाँ कैद है मेरे साथ हर उस हिस्से मे जिसे जीवन कहते है, सारी कायनात मे सबसे प्यारा है यह कोना............और यही से तो जन्मा हूँ और अब आख़िरी साँसों का सफर भी यही खत्म कर दूंगा, देखो वो कोना भी सिमटने लगा है.............यादें मिट रही है और एक अन्धेरा छा रहा है शाम ढल रही है और शफक भी खत्म हो रही है......धीरे धीरे, आहिस्ता आहिस्ता......
 

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