Saturday, April 14, 2012

एक बार फ़िर फराज...............

तुम्हारे लिए............सुन रहे हो................कहा हो तुम...............

उस शख़्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया


चढते सूरज के पूजारी तो लाखों हैं 'फ़राज़',
डूबते वक़्त हमने सूरज को भी तन्हा देखा

-अहमद फ़राज़

No comments: