Skip to main content

" 15 अगस्त " on Netflix , Post of 14 May 2021

" 15 अगस्त " on Netflix

राजू पेठे, मृण्मयी देशपांडे, आदिनाथ कोठारी का अभिनय और स्वप्निल जायेकर का निर्देशन मतलब दो घँटे चार मिनिट की एक लम्बी प्रेम कविता है जिसमें चुहल है, मस्ती है, बुजुर्गों के मुद्दे, मुम्बई की गांधी चाल में राजनीति, नगर सेवक के गुण दोष , देश है - अमेरिका है, गरीबी - अमीरी, पिकासो और एमएफ हुसैन है , और सबसे ज्यादा सघन प्रेम की अनुभूति है जो अंत तक आते - आते आपको अविरल अश्रुओं की धारा में इतना डूबो देती है कि फ़िल्म कब खत्म हुई आपको पता ही नही चलता

स्वतंत्रता और परतंत्रता के बीच एक ही चाल में रहने वाले दो युवाओं की कहानी है जो चाल के बाकि लोगों के बरक्स आज़ादी की असलियत, पूर्वाग्रह, समझ और मजेदार किस्सागोई की दास्ताँ है, पर एक चाल में साथ रहकर मत भिन्न होने के बाद भी लोगों में अपनापा और सहयोग कैसा होना चाहिये यह दिखाने में फ़िल्म सफल हुई है
बाल नायक का हाथ झंडा गाड़ने वाले डंडे के गड्ढे में फंस गया है और इस बहाने निर्देशक ने देश के समूचे विकास पर व्यंग्य किया है और हाथ गड्ढे में से निकालने के लिए किए जा रहें प्रयासों के ज़रिए पूरे विकास की प्रक्रिया और एडहॉक प्रयासों को जबरदस्त तरीके से दिखाया है जो हर बार फेल होते है पर अंत में झंडे को सलामी के समय हाथ बाहर निकलता है गड्ढे में से जो यह दर्शाता है कि देश, देश के राष्ट्रीय प्रतीक ही सबसे बड़े है व्यक्ति, पार्टी या कोई नेता देश नही हो सकता पर यह समझ होने के लिये हमें अभी और शिक्षा की आवश्यकता है, पूरी फिल्म में जाधव नामक चरित्र नवीन प्रयासों को करता जरूर है कि उस बाल नायक का हाथ गढ्ढे से निकल सकें और स्वतंत्रता दिवस मनाया जा सकें पर हर बार वह फेल होता है - बहुत बारीक प्रतीकों, उपमाओं और तीखे व्यंग्य भरे संवादों से ओत प्रोत फ़िल्म बड़ा सन्देश देती है , इसके समानांतर प्रेम की एक कविता है जो बड़े कैनवास पर लिखी जा रही है और जिसका अंत इतना आदर्श रूप में होता हैं कि पता ही नही चलता
" 15 अगस्त " साफ सुथरी , सरल, सहज, बहुत समृद्ध और बेमिसाल फ़िल्म है जो नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है
जरूर देखें

Comments

Popular posts from this blog

हमें सत्य के शिवालो की और ले चलो

आभा निवसरकर "एक गीत ढूंढ रही हूं... किसी के पास हो तो बताएं.. अज्ञान के अंधेरों से हमें ज्ञान के उजालों की ओर ले चलो... असत्य की दीवारों से हमें सत्य के शिवालों की ओर ले चलो.....हम की मर्यादा न तोड़े एक सीमा में रहें ना करें अन्याय औरों पर न औरों का सहें नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." मैंने भी ये गीत चित्रकूट विवि से बी एड करते समय मेरी सहपाठिन जो छिंदवाडा से थी के मुह से सुना था मुझे सिर्फ यही पंक्तिया याद है " नफरतों के जहर से प्रेम के प्यालों की ओर ले चलो...." बस बहुत सालो से खोज जारी है वो सहपाठिन शिशु मंदिर में पढाती थी शायद किसी दीदी या अचार जी को याद हो........? अगर मिले तो यहाँ जरूर पोस्ट करना अदभुत स्वर थे और शब्द तो बहुत ही सुन्दर थे..... "सब दुखो के जहर का एक ही इलाज है या तो ये अज्ञानता अपनी या तो ये अभिमान है....नफरतो के जहर से प्रेम के प्यालो की और ले चलो........"ये भी याद आया कमाल है मेरी हार्ड डिस्क बही भी काम कर रही है ........आज सन १९९१-९२ की बातें याद आ गयी बरबस और सतना की यादें और मेरी एक कहानी "सत...

हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ

एक जंगल था। उसमें में हर तरह के जानवर रहते थे। एक दिन जंगल के राजा का चुनाव हुआ। जानवरों ने शेर को छोड़कर एक बन्दर को राजा बना दिया। एक दिन शेर बकरी के बच्चे को उठा के ले गया। बकरी बन्दर राजा के पास गई और अपने बच्चे को छुड़ाने की मदद मांगी।बन्दर शेर की गुफा के पास गया और गुफा में बच्चे को देखा, पर अन्दर जाने की हिम्मत नहीं हुई। बन्दर राजा गुफा के पेड़ो पर उछाल लगाता रहा.. कई दिन ऐसे ही उछाल कूद में गुजर गए। तब एक दिन बकरी ने जाके पूछा .." राजा जी मेरा बच्चा कब लाओगे.. ?" इस बन्दर राजा तिलमिलाते हुए बोले "-: .. . . . हमारी भागदौड़ में कोई कमी हो तो बताओ "

चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास

शिवानी (प्रसिद्द पत्रकार सुश्री मृणाल पांडेय जी की माताजी)  ने अपने उपन्यास "शमशान चम्पा" में एक जिक्र किया है चम्पा तुझमे तीन गुण - रूप रंग और बास अवगुण तुझमे एक है भ्रमर ना आवें पास.    बहुत सालों तक वो परेशान होती रही कि आखिर चम्पा के पेड़ पर भंवरा क्यों नहीं आता......( वानस्पतिक रूप से चम्पा के फूलों पर भंवरा नहीं आता और इनमे नैसर्गिक परागण होता है) मै अक्सर अपनी एक मित्र को छेड़ा करता था कमोबेश रोज.......एक दिन उज्जैन के जिला शिक्षा केन्द्र में सुबह की बात होगी मैंने अपनी मित्र को फ़िर यही कहा.चम्पा तुझमे तीन गुण.............. तो एक शिक्षक महाशय से रहा नहीं गया और बोले कि क्या आप जानते है कि ऐसा क्यों है ? मैंने और मेरी मित्र ने कहा कि नहीं तो वे बोले......... चम्पा वरणी राधिका, भ्रमर कृष्ण का दास  यही कारण अवगुण भया,  भ्रमर ना आवें पास.    यह अदभुत उत्तर था दिमाग एकदम से सन्न रह गया मैंने आकर शिवानी जी को एक पत्र लिखा और कहा कि हमारे मालवे में इसका यह उत्तर है. शिवानी जी का पोस्ट कार्ड आया कि "'संदीप, जिस सवाल का मै सालों से उत्तर खोज रही थी व...