Thursday, November 19, 2015

Posts of 19 Nov 15



"...अचानक मुझमें असंभव के लिए आकांक्षा जागी। अपना यह संसार काफी असहनीय है, इसलिए मुझे चंद्रमा, या खुशी चाहिए-कुछ ऐसा, जो वस्तुतः पागलपन-सा जान पड़े। मैं असंभव का संधान कर रहा हूँ...देखो, तर्क कहाँ ले जाता है-शक्ति अपनी सर्वोच्च सीमा तक, इच्छाशक्ति अपने अंतर छोर तक ! शक्ति तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक अपनी काली नियति के सामने आत्मसमर्पण न कर दिया जाये। नहीं, अब वापसी नहीं हो सकती। मुझे आगे बढ़ते ही जाना है"

ना जाने क्यों मुझे कालिगुला, हर्ष और वे तमाम चरित्र याद आने लगे है जो "मुझे चाँद चाहिए" में वर्णित है..........

हर्ष की याद आना इस समय स्वाभाविक है और उसका अंत..........उफ़...........

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