Wednesday, July 1, 2015

Post of 1 July 15 "घोषणा वीर बनने के बजाय अमलीजामा पहनाएं योजनाओं को"

घोषणा वीर बनने के बजाय अमलीजामा पहनाएं योजनाओं को


मप्र देश में शायद अग्रणी राज्य होगा जो करोडो रुपया लगाकर, बड़ा मानव श्रम खर्च करके और पुरी प्रशासनिक मशीनरी लगाकर लगभग हर वर्ष एक उत्सव की तरह से इन्वेस्टर्स मीट करता है. प्रदेश के मुख्यमंत्री अपनी टीम के साथ इस कार्यक्रम को इस तरह संयोजित करते है मानो यह उनका कोई निजी पारिवारिक कार्यक्रम हो, इस बात के लिए उनकी तारीफ़ की जाना चाहिए. इंदौर, भोपाल, जबलपुर, खजुराहो, बाबई (होशंगाबाद) आदि इसके उदाहरण है. ज़रा याद कीजिये देवास, पीथमपुर, लेबड़, घाटाबिल्लौद और ऐसे कितने ओद्योगिक क्षेत्र थे जो सड़क-बिजली-पानी के चलते बंद हो गए और रही सही कसर बाजारीकरण, और भूमंडलीकरण ने पुरी कर दी. इस समय देश के अन्य क्षेत्रों की तरह से मालवा में भी काम छोड़े मजदूरों की संख्या भयानक है और बेरोजगारी के चलते सामाजिक, आर्थिक और राजनितिक परिस्थितियाँ खराब हुई है. कुपोषण, बीमारियाँ, मात्र और शिशु मृत्यु दर में बढ़ौत्री के साथ अपराध में भी अब मप्र देश में चमकने लगा है. कल अखबार में खबर पढी कि इंदौर में देश का पहला एलईडी प्लांट लगाया जाएगा और आसपास के पांच जिलों में हार्ड वेयर की इकाईयां बनाकर इस पुरे मालवे को एक बार पुनः उद्योग जगत के नक़्शे पर लाया जाएगा. निसंदेह प्रदेश शासन का यह निर्णय सराहनीय है, परन्तु ज़रा एक बार यह विचार करने की जरुरत है कि करोडो रूपये खर्च करने के बाद चार-पांच इन्वेस्टर्स मीट का क्या नतीजा हाथ में है, क्या प्रदेश में कोई औद्योगिक विकास द्रुत गति से हुआ या बड़ा उद्योग स्थापित हुआ? इंदौर में टी सी एस से लेकर बड़े सॉफ्टवेयर उद्योगों की बात बार-बार हुई, परन्तु आज तक यहाँ सिवाय झुनझुनों के कुछ दिखाई नहीं देता, आखिर क्या कारण है कि मध्य प्रदेश में इन्वेस्टर्स मीट के बाद रुपया नहीं आता या उद्योग स्थापित नहीं होते और गुजरात में ऐसी मीट होने के बाद उद्योग भी लगे, काम भी शुरू हुआ और लोगों को रोजगार भी मिला, गुजरात की छबी बदली. अस्तु, दस वर्षों में नरेंद्र मोदी की छबि एक उद्योग फ्रेंडली राजनेता की बनी और इसी के आधार पर वे मात्र दस वर्षों में देश के शिखर स्थान पर जा पहुंचे, जबकि मप्र में शिवराज सिंह भी दस वर्षों से एक छत्र राज कर रहे है, परन्तु प्रदेश में उद्योगों की संख्या बढ़ने के बजाय घट रही है या स्थिर हो गयी है. सेज से लेकर तमाम तरह के प्रयोग इस सरकार ने किये, बड़े-बड़े लोगों को बुलाया, सरकारी व्यवधान हटाने की, जमीन देने की, नामांतरण प्रक्रिया सरल बनाने की, बिजली देने की और आवागमन के साधन बनाने की घोषणाये  हुई, दो तीन कारीडोर बने और अभी फिर एक घोषणा हुई थी इंदौर भोपाल कारीडोर की. यहाँ तक कि हर मीट में आश्वस्त किया गया कि “सिंगल विंडो” का प्रयोग किया जाएगा ताकि उद्योग लगाने वालों को एक ही छत और खिड़की तले सारी सुविधाएं मिल सकें, परन्तु इंदौर में हम देख रहे है कि टी सी एस से लेकर मेदान्ता समूह तक को जमीन हस्तांतरण के लिए अभी भी कितने पापड बेलना पड़ रहे है!!! ऐसा नहीं है कि मप्र में कुशल मानव श्रम की कमी है, यही के होनहार युवा देश के दीगर बड़े शहरों में जा रहे है और रुपया कमाकर अपना परिवार भी पाल रहे है और शोध, अन्वेषण करके रोज नए काम भी कर देश का नाम रोशन कर रहे है, आज प्रदेश में आवश्यकता से अधिक तकनीकी महाविद्यालय है और हजारों कौशल एवं दक्षता सिखाने वाले संस्थान है – जिन्होंने कुशल युवाओं का निर्माण किया है, अच्छा खासा मार्केट है, प्रदेश के अनेक हिस्सों की कनेक्टिविटी भी पहले की तुलना में आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ी है, सूचना तकनीकी संजाल में भी प्रदेश अब अग्रणी है और लगभग हर बड़े नेटवर्क का यहाँ अच्छा संयोजन है, ‘फोर-जी’ भी प्रायोगिक तौर पर लांच किया जाकर अब बड़े पैमाने पर फैलने के लिए तैयार है. अब शायद शासन, प्रशासन और राजनैतिक इच्छा शक्ति की परीक्षा है कि कैसे इस तरह की घोषणाओं को अमल में लाये और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन का अमलीजामा पहनाएं. दरअसल में लोगों का विश्वास बनाए रखना किसी भी शासक की पहली और आधारभूत शर्त होती है, यदि सिर्फ और सिर्फ घोषणावीर बनकर या अपने घर में पंचायतें लगाकर जनता को हर बार झुनझुना देंगे तो यह लम्बे समय तक चलेगा नहीं, लोकतंत्र में जनता अब जागरुक है और त्रस्त भी, शायद शिवराज सरकार के लिए ये समय बहुत मुश्किल भरा है जब एक और उन पर कई प्रकार के आरोप है, यहाँ तक कि केंद्र सरकार पर भी इसी प्रकार के दबाव है जब प्रधानमंत्री विदेश तो लगातार जा रहे है परन्तु जिस मात्रा में धन का वित्तीय निवेश देश में होना चाहिए वह नहीं हो रहा. यही बात मप्र में भी लागू होती है पांच- छः इन्वेस्टर्स मीट होने के बाद प्रदेश में इस समय कोई बड़ा उद्योग नजर नहीं आता जहां दस हजार श्रमिक काम करते दिख रहे हो या किसी क्षेत्र विशेष में समृद्धि दिखाई दें. बल्कि इस तरह की खबरें सिर्फ अखबार में किसी शोधार्थी या विद्यार्थी के लिए एक फाईल कटिंग बनकर रह जाती है और बात आई गयी हो जाती है जो कि अंततोगत्वा सरकार में विश्वास खोने और आस्था ख़त्म होने की स्थिति में पहुँच जाती है. उम्मीद की जाना चाहिए कि शिवराज सरकार सिर्फ घोषणावीर ना बनकर वास्तव में ऐसे सभी लंबित मामलों की गंभीरता से पड़ताल करेगी और प्रदेश को पुनः एक कल-कारखानों से धड़कता हुआ और रोजगार की सम्भावनाओं से युक्त प्रदेश बनाकर जनता की उम्मीद को बरकरार रखेगी, क्योकि यदि लोगों को अपने ही परिवेश में काम मिलेगा तो वे बाहर शोषित होने क्यों जायेंगे?

संदीप नाईक

स्वतंत्र टिप्पणीकार 

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