Monday, July 27, 2015

गुरदासपुर हमला एक गंभीर चेतावनी है




गुरदासपुर पर हुआ हमला दुखद है, इसके तुरंत बाद मोदी जी द्वारा की जा रही त्वरित कार्यवाही यथा केन्द्रीय सुरक्षा बालों को, एनएसजी को तुरंत गुरदासपुर रवाना करना और उच्च अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति का जायजा लेना आदि प्रशंसनीय है. दरअसल मुझे लगता है कि यह आतंकवादियों की ओर से एक चेतावनी थी जबकि सुप्रीम कोर्ट याकूब मेनन की अर्जी पर कोई निर्णय लेने वाला था. यह भारत जैसे बड़े देश को एक बार फिर धमकाने और कमजोर करने की बड़ी साजिश है. कंधार काण्ड याद कीजिये और वह ब्लैकमेल. मुझे लगता है कि यह सिर्फ आतंकवादी हमले की बात नहीं, बल्कि हमारे पुरे खुफिया तंत्र और मुस्तैदी का भी सवाल है कि आखिर हमारी गुप्तचर एजेंसियां क्या कर रही है, केंद्र सरकार ने हाई अलर्ट छह लोगों की मौत के बाद जारी किया जबकि 30 तारीख जैसे जैसे पास आ रही थी तो क्या सरकार को स्वतः संज्ञान लेकर देश, सुरक्षा बलों को सचेत रहने को नही कहना चाहिए था ? दूसरा, इस समय दुनिया की नजर याकूब की फांसी पर लगी है तो चाक चौबंद रहना क्या हमारी जिम्मेदारी नही थी ? वे तीन-चार आतंकवादी तो मानव बम बनकर थाने में बैठे ही है जो 112 इंच का सीना लेकर वे तो मरे ही सेना के हाथों पर हमारी सुरक्षा व्यवस्था का क्या ? 

थोड़ा समझे कि आखिर क्या कारण है कि ऐसी स्थितियां निर्मित होती है, राजनाथ सिंह का बयान आता है लगभग ग्यारह बजे कि कोई मामला गंभीर नहीं है और स्थिति पूर्ण रूप से नियंत्रण में है, और एक घंटे बाद खबर आती है कि एसपी बलदेव शहीद हो जाते है. यानि हम मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहे है, हमें अंदाज ही नहीं है कि वे तीन-चार आतंकवादी कितना बारूद असला लेकर अन्दर बैठे है? हम पुराने बाबा आदम के जमाने के हथियारों से उनका मुकाबला कर रहे है फलस्वरूप हमें अपने निर्दोष नागरिक, पुलिस के जवान और वरिष्ठ अधिकारी खोना पड़ रहे है.

दूसरा महत्वपूर्ण सारा देश केंद्र और राज्य की आपसी खींचतान के नाटक को सरेआम देख रहा है, कल मुख्यमंत्री बादल ने भी इस सारी गलती और सुरक्षा में लापरवाही का ठीकरा केंद्र पर फोड़ा, जोकि बहुत ही गंभीर मसला है. अरविन्द, नजीब जंग और मोदी की लड़ाई मीडिया के विज्ञापनों से होते हुए अब सडकों पर दिखाई देने लगी है और इस वजह से कही कोई निर्णय लेने वाला नहीं है. देश की पुरी व्यवस्था एक व्यक्ति के हाथों में आ गयी है. सोशल मीडिया पर चले वाक्युद्ध में भी 56 इंच के सीने के बहाने लोगों ने सरकार को जी भरकर कोसा. आखिर हम किस समाज और व्यवस्था में जा रहे है. सरकार के सारे दांव उलटे पड़ रहे है. केंद्र-राज्य के रिश्ते सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रहे है और केंद्र एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर तरह के फैसले अपने हाथ में केन्द्रित रखना चाहता है

इस समय यह घटित होना दर्शाता है कि देश को कमजोर करने वाली ताकतों को इस बात का पुख्ता भरोसा है कि वे चाहे जो करें पूरा देश सो रहा है, बॉर्डर पर आये दिन घुसपैठ, हमारे जवानों और अधिकारियों की ह्त्या होना स्वाभाविक हो गया है, महिलाओं के साथ अत्याचार बढे ही है, आम आदमी की सुरक्षा के लिए कही कोई संगठित प्रयास नहीं दिखते, प्रशासन पुरी तरह से बेखौफ होकर हर जगह काम कर रहा है, वरिष्ठ अधिकारी ना केंद्र में काम करना  चाहते है, ना दिल्ली में - तो आखिर ये सब क्यों हो रहा है और कब तक होता रहेगा?

गुरदासपुर की एक घटना ने हमारी पोल खोल कर रख दी है जोकि हमारी पतनशील होती राजनीती का एक बड़ा उदाहरण है. राजनीति करना, मतभेद होना, विचारों में असहमति होना, कार्य शैली में भिन्नता होना और स्वस्थ बहस होना एक परिपक्व लोकतंत्र का परिचायक है परन्तु इस सबके बदले हम देश के निरपराध नागरिकों और सुरक्षा जवानों से लेकर अधिकारियों की जान जाना क्या हमारे प्रगतिशील होने का परिचायक है?


देश दिल्ली और मन की बात से बहुत दूर होता है प्रधानमंत्री जी, हम यह कब समझेंगे ???

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