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Posts of 10 to 13 June 15




लौटना होता तो नही फिर भी हम लौट आते है कुछ जगहों पर निशाँ देकर और रिसते घावों को समेटते से जैसे लौट आती है बूँदें गरज और छींटों के साथ !!!

ये बारिश और धूप के बीच उमस अब तुम सी लगती है चिपचिपी और लिजलिजी जो सिर्फ तकलीफदेह है और कुछ नही.

भिगोती रही रात धीरे धीरे , घुलता रहा मैं इन बूंदों के बीच ! ओ सुबह कहाँ है तुम्हारा सूरज ? आसमान काला है और दूर किसी कोने से एक फटा हुआ कोना उजागर हो गया है जहां से वो रक्तिम किरणें बिखर रही थी पानी की बूंदों के बीच पता नही चला, अँधेरे की दहशत में कब दोनों एक हो गए अचानक....देख रहा हूँ कि पेड़ों के पत्ते हरे हो गए है और मिट्टी थोड़ी सी इठलाते हुए गीली होकर धंस रही है अपनी जगह छोड़कर.

सर्पीली सी काली रात में इन उजाड़ सड़कों पर भीगते हुए कुत्तों को मिमियाते हुए देखना त्रासद ही है, याकि किसी सूखते जा रहे पेड़ को जिसपर अचानक तेज फुहारें पड़ती हो और पत्तें बोझ भी ना सह पाएं और झूलने लगे मौत के दंश से डरते किसी जीवन की तलाश में ! यह बारिश का ही उपकार है कि हमें बूंदों के बीच से भिगोते हुए अपने भीतर के एक पर्व को महसूसने का वक्त देती है।

एक लड़की भीगी भागी सी गाने वाले स्व. किशोर कुमार के शहर के किसी होटल के एक कमरे में बैठकर तेज गरज की आवाजों से भीग रहा हूँ और बारिश की तेज फुहारों को धूप की आंच से निकलकर चंद्रमा को ढाककर आसमान से नीचे गिरते देख रहा हूँ। एक मटमैली सी दुर्गन्ध फ़ैली है फिजाओं में जो अब सुवास बनकर घुल रही है आहिस्ते से मेरे भीतर और इस सबमे यह कहना ही भूल गया हूँ कि ये मौसम की बारिश का पहला दृश्य है जो अब अंदर धंस रहा है और मैं इसे भींच लेना चाहता हूँ एक आईने के मुआफिक जो अक्सर झूठ बोलकर इन्ही बूंदों की तरह मेरे दर्प को , मेरे अहं को और सब कुछ को निचोड़ कर रख देता है!


हे शूरवीरों और महामानव उस ससुरे दाऊद को ले आओ या वही जाकर निपटा दो साले को बहुत ग़दर मचा रखा है और अब अपने देश के भीतर भी यही करो नक्सलवादी हो, आतंकी, सिमी के लोग , विरोधी हो कोई मर्द बलात्कारी हो, भृष्ट मानव जो व्यापम में शामिल हो, खनिज का पुजारी हो या ससुरा कल्लू पॉकेट मार.... घर में घुसो और टपका दो... वैसे भी ससुरी सेना को काम है नही कुछ.... निठल्ले मुफ़्त की दारु पीकर मेस में रोटी तोड़ते रहते है। सुन रहे है ना 56 इन्चियां मियाँ मुंह मिठ्ठू !!!

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