Sunday, May 8, 2016

संगीत का सफ़र - यादों की स्मृतियों के संग



दिन - दूसरा 

1966 में आई थी फिल्म ममता और रोशन लाल के संगीत से निबद्ध इसके गीतों ने धूम मचा दी थी, मजरूह सुल्तानपुरी के गीत मतलब मानो किसी ने दिल काटकर सामने रख दिया हो, और फिर लता जी की आवाज में यह गीत जब सुचित्रा सेन पर फिल्माया गया तो लगा कि सुचित्रा इसी गीत के फिल्मांकन के लिए ही फिल्म जगत में आई हो, एकअल्हड जवानी का प्यार, द्वंद और मासूम से चेहरे पर जो हिकारत और तंज में वो अभिनय किया कि अशोक कुमार की बेचैनी पूरे परदे पर हर उस दर्शक ने अपने अन्दर महसूस की जो इस परिस्थिति से दो चार हुआ हो.

ग़ालिब ने लिखा था- बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले क्योकि उस जन्नत में सेवफल खाकर आदम और हौव्वा को ज्ञान आया जिसे अंगरेजी के मशहूर कवि जॉन मिल्टन ने अपने महाकाव्य 'पेराडाईज लॉस्ट' की शुरुवात भी इसी सन्दर्भ से की है जॉन खुद देख नहीं सकते थे पर सूरदास की तरह उनके पास अंतर्मन में वो आँखें थी जो सब कुछ देख लेती थी, मजरूह साहब ने भी कूचा शब्द का बेहतरीन प्रयोग इस गीत की दूसरी पंक्ति में किया और बल्कि मै तो कहूंगा कि उन्होंने कूचे से बाहर आकर अपने को गुनहगार भी मान लिया. पूरा गीत सुचित्रा सेन और तीन चार कलाकारों पर फिल्माया गया है और पूरे दृश्य में अशोक कुमार की उस ना कही जा सकने वाली बेचैनी को उभारा गया है जो वो कह भी नहीं पा रहे और अंत में कुर्सी पर निढाल होकर बैठ जाते है. मजरूह साहब ने लता जी की खनकती आवाज में पूरे प्रेम की दास्ताँ को बयाँ किया है जिसे रोशन के संगीत ने तबले और हारमोनियम के सुरों में गुंथकर इसे अप्रतिम और अमर बना दिया है.
सौ रूप धरने के बाद जहर पीने के बाद भी ठोकर लगाने की उम्मीद में वह ज़िंदा है कुछ इस तरह कि इतिहास में वो एक गिरती हुई दीवार बनकर अपने आप को उसमे चुनवा देना चाहती हो मानो जैसे फिल्म कुदरत में दीवार में चुनवा देने का दृश्य था प्रिया राजवंश का या अमेरिकन नाटककार ओ'नील के नाटक "मोर्निंग बीकम्स इलेक्ट्रा" की नायिका अंत में घर के सारे दरवाजे खिड़की बंद कर अपने को खत्म कर लेती है.
मुझे पंचमढी डाईट का होस्टल, रायसेन का होस्टल, भोपाल और रायसेन के बीच बनी वो किसी दरवेश की मजार या भोपाल रीजनल कॉलेज ऑफ़ एजुकेशन के पत्थरों के बीच गुजारी वो शामें शिद्दत से याद आती है जब किसी मद्धिम आवाज में यह गीत शुरू हो जाता, और फिर एक गहरी सांस लेकर थक जाती थी तुम.........
अब एक बार फिर से गाओ ना, आज मै गा रहा हूँ "दावा था जिन्हें हमदर्दी का........

https://www.youtube.com/watch?v=BMwmPaZHYiM

दिन - पहला 

ये दर्द कहाँ से आता है जब कोई माशूक डूबकर कहता है इन बहकी निगाहों, अदाओं और काजल की काली घटाओं में डूबकर मुझे भूल जाना, आरोह अवरोह में बनी हुई उस कहानी को भूलने की ताकीद दी जा रही है जो एक चमन में बनी थी और गर्म साँसों के साथ, बदरी के साथ बूंदों की रुमझुम को शिद्दत से याद करते हुए भी भूल जाने की बात है, पर दर्द और तन्हाई की इस बेला में भी वो मस्ती और आलम की बात, विदाई के मोड़ पर भी साथ की बात एक सच्चा प्रेमी ही कर सकता है - जो अलग होकर भी अपने माशूक और कभी जिसके साथ दो पल गुजारे थे उसके लिए सारा आसमान देने की दुआएं दे रहा है. चुप्पी का अपना एक फ़साना होता है यह गीत सुनकर ही समझ आता है.

पंकज दा यानि पंकज मलिक की मूल आवाज से ज्यादा मुझे लता जी का पंकज दा को दिए ट्रिब्यूट की आवाज में यह गीत ज्यादा अपील करता है. पंचमढी की भर गर्मी में एक रात को डाईट के होस्टल की छत पर खंडवा की एक बुजुर्ग शिक्षिका ने अपने महीन स्वरों में यह गीत सुनाया था, श्रीमती राउत नाम था उनका, कैसेट्स का ज़माना था और तुम्हारे कहने पर फौजदार बस के कंडक्टर से डबल भाव देकर यह श्रद्धांजली का कैसेट मंगवाया था और फिर उन पंद्रह दिनों में इसे इतना सुना कि खराब हो गया सब कुछ - कैसेट, जीवन और फिर सब भूलना भी पडा.
संगीत, प्यार और जीवन की थोड़ी बहुत समझ आने के बाद पंकज मलिक से यह पहली मुलाक़ात थी और उनकी आवाज ने जादू कर पागल कर दिया था.
"पहले मिलन की छाँव में तुमसे तुम्हारे गाँव में 
आँखे हुई थी चार क्यों, ये ना बता सकूंगा मै, 
रूप की कुछ कमी नहीं. दुनिया में एक तुम्ही नहीं
फिर भी तुम्हारी चाह में रहता हूँ बेकरार क्यों
दिल को है तुमसे प्यार क्यों, ये ना बता सकूंगा मै."

ये सिर्फ शब्द, गाना और आवाज नही थी बल्कि एक संत्रास, पीड़ा और व्यथा थी एक व्यक्ति की जो प्यार में डूबा है और कह भी नहीं पा रहा है.
Yunus Khan भाई ने एक अच्छा काम शुरू किया, Ashutosh Dubey Chandan Pandey आदि मित्रों ने पिछले सात दिनों में बेहतरीन गीत, कम्पोजीशन और शब्दों से परिचय करवाया तो याद आया यह गीत, कोशिश करूंगा कि अगले सात दिनों तक अपनी धुंधली स्मृतियों में बसे गीतों की यादों और प्रसंग से जुड़े कुछ किस्से लिख सकूं, और आपको कुछ गीत सुना पाऊं.
आज प्रस्तुत है लता जी की दिलकश आवाज में पंकज दा को श्रद्धांजली स्वरुप यह अमर गीत जो बहुत ही दर्द और उम्मीद से भरा है मानो हम सबके जीवन का गीत...... !!!!
https://www.youtube.com/watch?v=GRFSwVFBmyU

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