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फ़ैज़ अहमद फैज़...रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

फ़ैज़ अहमद फैज़...
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
एक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ए-ख़ुश’फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आख़िरी शम्में भी बुझाने के लिए आ
(मरासिम=agreements/relationships, रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया=customs and traditions of the society.. सबब=reason, ख़फ़ा=angry.. पिन्दार=pride… लज़्ज़त-ए-गिरिया=taste of sadness/tears… महरूम=devoid of, राहत-ए-जाँ=peace of life ...दिल-ए-ख़ुश’फ़हम=optimistic heart, शम्में=candles)

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