Sunday, July 30, 2017

काले बादलों में सुरों का क्रंदन - इतिहास में शास्त्रीय गायिका की मौत - 30 July 2017


gangubai hangal എന്നതിനുള്ള ചിത്രം



kishori amonkar എന്നതിനുള്ള ചിത്രം


काले बादलों में सुरों का क्रंदन - इतिहास में शास्त्रीय गायिका की मौत
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1
मरना तो सबको ही होता है क्योकि बचा कौन है
अमरता का पट्टा कोई नही लिखाकर लाता
आम लोग हो, कलाकार या अभिनेता याकि इतिहासकार
बल्कि आम लोग बहुत धैर्य और शांति से मरते है 
कलाकार या अभिनेता उत्तेजना में मौत से याचना करते है

वो भी मर रही है ऐसे ही उत्तेजित होते हुए बगैर जाने कि
बेगम अख्तर, शमशाद बेगम या गंगुबाई भी मरी होगी
अभी किशोरी अमोनकर भी यूँही मरी थी यकायक
देख रहा हूँ कि वो भी मर रही है ऐसे ही हर पल हर रोज
जबसे उसने गाने के बजाय नकल को धँधा बना लिया

यह बाजार का जमाना है जो हमारे घर मे घुस आया है
यह अपने जन्मनाओं की कला को बेचने का समय है
यह रागों को छोड़कर घराने बनाने का समय है रसिकों
मौत से रुपया कमाकर कला की नुमाइश का समय हैे
देख रहा हूँ कि शास्त्रीयता की आड़ में बिक रही है कला

अब शास्त्रीयता का एक आवरण ओढ़े बाजार में है वह
जहां उद्योगपति जाम लेकर सराहते है कला का मर्म
अधिकारी पढ़ते है कविता बेहूदी सी वाहवाही के लिए
संगीत अब उनके कोठों ने दर्ज है जो अनुशासित है
ऐसे में एक शास्त्रीय गायिका की मौत का अचरज नही मुझे।

2
जब उसने कहा कि मैं संगीत की दुनिया मे स्थापित हूँ
विदुषी से लेकर गुरु के उदबोधन भी छोटे थे उसके लिए
इसी दुनिया की कहानी थी जो मौत खत्म कर रही थी
गायिका को तीक्ष्ण व्यवसायिक बुद्धि में बदल रही थी
यह इतिहास की एक घटना थी जो पृथ्वी पर घटित हुई।

संगीत के इस पृष्ठ पर दर्जनों जगह अंकित है कहानियां
किसी को नही बख्शा इस नामुराद मौत ने, ले गई हर बार
खत्म हो गई उन्ही के साथ उन्ही की रागिनियाँ बन्दिशें
सीखने की बातें और ताल टूटने के सड़ियल किस्से भी
संसार यह याद नही रखता, बल्कि याद रहते है कर्म।

एक शास्त्रीयता जीवन मे भी होती है बारीकी से बुनी हुई
जो मनुष्यता को इतर जीवनानुभवों से अलग करती है
यही से आता है सुरों का आरोह अवरोह और मूल तमीज
बस गर यही खो दिया तो खत्म हो जाता है मालकौंस
भैरवी की दहलीज पर देख दुखी हूं इतिहास बनते पन्ने।

कमसिन उम्र से प्रौढ़ावस्था में पूरे समर्पण का भाव खत्म हुआ 
सीखने की अदम्य लगन भी खत्म हुई इस पड़ाव पर अंत मे
यह दुखद था कि काली चार के सुर एक जगह जाकर फटे
और एक बेसुरे से माहौल में मंद सप्तक पर तीन ताल बिखरे
यह मौत का आनुष्ठानिक स्वस्फूर्त रोजनामचा था जो बुना था 
एक ऐसी चौखट पर जहां संगीत के बाद वणिक बुद्धि काम आती है

मुझे अफसोस ही नही है सिर्फ दो शब्द कहना है - ओम शांति !

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