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प्राथमिक शिक्षा और भेदभाव की नीति 22 जुलाई 17 की पोस्ट


कल एनडीटीवी पर प्राइम टाइम पर मप्र के शाजापुर और आगर जिले में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की पोस्टमार्टम परक रपट देखकर बहुत दुख हुआ। प्रदेश में मैंने 1990 से 1998 तक बहुत सघन रूप से राजीव गांधी शिक्षा मिशन के साथ काम करके पाठ्यक्रम, पुस्तकें लिखना, शिक्षक प्रशिक्षण और क्षमता वृद्धि का कठिन काम किया था । अविभाजित मप्र में बहुत काम करके लगा था कि अब आगे निश्चित ही शिक्षा की स्थिति में सुधार होगा, इसके बाद कई स्वैच्छिक संस्थाओं में रहा, प्राचार्य के पदों पर रहा , फंडिंग एजेंसी में रहकर शिक्षा को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं को पर्याप्त धन उपलब्ध करवाया। राज्य योजना आयोग में रहकर भी प्राथमिक शिक्षा माध्यमिक शिक्षा और कालांतर में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा के लिए काम किया पर कल अपने ही राज्य में इस तरह से की जा रही लापरवाही और उपेक्षा देखकर मन खिन्न हो गया।

ठीक इसके विपरीत केंद्र पोषित शिक्षा के भेदभाव भरे मॉडल। मुझे लगता है कि जिलों में स्थित केंद्रीय , नवोदय , उत्कृष्ट और मॉडल स्कूल एक तरह की ऐयाशी है और शिक्षा के सरकारी पूँजीवर्ग जो सिर्फ एक वर्ग विशेष को ही पोषित करते है। हालांकि यहां दलित, वंचित जरूर है पर अभावों की जमीन पर ये सर्व सुविधाओं से परिपूर्ण टापू है जिनका फायदा जिले में मात्र 1 % लोगों को भी मुश्किल से मिल पाता है।

एक मित्र जो केंद्रीय विद्यालय से जुड़े है जो कहते है कि केंद्रीय, नवोदय विद्यालयों में  RTE में एडमिशन में कोई इनकम क्राइटेरिया नहीं इसलिए यहां भी अफसरों के बच्चे 12वी  तक निःशुल्क शिक्षा में एडमिशन पा जाते हैं। आरक्षण में आर्थिक आधार चाहिए मगर RTE जो गरीबों का भला कर सकता है उसमें लॉटरी यदि यह क़ायदे से लागू हो जाये तो 4 सेक्शन विद्यालय में 40 गरीब बच्चे 12वी तक बढ़िया शिक्षा ले सकते हैं। किताबें और यूनिफार्म, ऑटो आदि का पूरा किराया मुफ़्त ! यानी देखिए कि किस तरह से अफसर , नेता और प्रशासन मिलकर वहां भी छेद करके अपने लिए रास्ते निकाल लेते है। बेहद शर्मनाक तंत्र हमने गत 70 वर्षों में विकसित कर लिया है। इन शिक्षकों को घर आने जाने के लिए हवाई यात्रा भी सरकार मुहैया कराती  है, बड़े स्तर पर क्षमता वृद्धि, रिफ्रेशर और अन्य काम होते है पर हमारे माट साब ढोर बकरी गिनते हुए और पंचों की गालियां खाकर ही नर्कवासी हो जाते है। ना छत, ना पानी,ना शौचालय, ना प्रशिक्षण , ना वेतन , ना भवन और ना इज्जत - बाकी सब तो दिवास्वप्न है।

अब शायद वर्तमान सरकार को यह चुनौती हाथ मे लेनी चाहिए कि हर जगह शिक्षा एक हो और कम से कम ये जो बहुविद्यालय पद्धति और तंत्र है इसे खत्म करें। एक ओर हमारे अतिथि शिक्षक मात्र ₹ 100 प्रतिदिन पर हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी पढ़ा रहे है वही केंद्रीय विद्यालय का चतुर्थ वर्ग का भृत्य तीस से पचास हजार माह के ले रहा है , यह घोर भेदभाव है जो सरकार प्रायोजित है।

शिक्षक संघ फालतू के मुद्दों और बाकी सबको छोड़कर एक देश और एक शिक्षा प्रणाली की बात करें । या तो केंद्र शिक्षा को राज्यों से छीनकर अपने हाथ मे ले लें या पूरी तरह से राज्यों को सौंप दें, अब यह भयानक भेदभाव नही चलेगा और ना करना चाहिए। यह पद्धति समाज मे भयानक खाई बढ़ा रही है और लोगों के जीवन को सीधा सीधा प्रभावित कर रही है।

#Bring_Back_Pride_to_Govt_Schools

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