Friday, January 1, 2016

Post of 31 Dec 15



न शबो रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है,
किस बरहमन ने कहा था कहा था कि ये साल अच्छा है।

- अहमद फ़राज़
देखिये पाते है उश्शाक बुतों से क्या फैज़
इक बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है

- मिर्ज़ा ग़ालिब
समझ नहीं आ रहा किसे सही मानूं..............????
इससे तो लगता है कि
"इक बार वक्त से लम्हा गिरा कही, 
वहाँ दास्ताँ मिली, लम्हा कही नहीं, 
थोड़ा सा हंसा के, थोड़ा सा रुला के, 
पल ये भी जाने वाला है, आने वाला साल भी जाने वाला है"

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