Saturday, January 17, 2015

डेढ़ इंच का टुकड़ा



फिर लगा कि यह रात नहीं आसमान के नीचे से गुजरने वाली एक लम्बी सुरंग है जो कभी ख़त्म नहीं होगी, ठंडी हवाएं चल रही थी और सामने थी लम्बी विशाल झील जिसका पानी एक बर्फ के मानिंद पडा हुआ था और उस पर से चलकर बत्तखें कही आ - जा रही थी, सिंगाड़े के पौधे चहक रहे थे और कमल के फूल मानो प्लास्टिक में बदल गए थे, क्रूरता अपने शबाब पर थी, और मै दूर उस आसमान में एकटक देख रहा था, घड़ी की सुईयां ऐसे सरक रही थी मानो सीढीयां हो किसी अंधे चढ़ाव की जो कही ख़त्म नहीं होती और सदियों से वही पडी है....थोड़ी  देर बाद इस सुरंग में एक चाँदनुमा सफेदी का डेढ़ इंच का टुकड़ा कही से निकल आया और फिर मुस्कुराकर मुझसे बतियाने लगा - सवाल, उफ़, ये सवाल और सवाल बस लगा कि अब ये रात, ये सुरंग और ये डेढ़ इंच का चाँद यही ठहर जाए, बर्फ की सतह वाले झील अचानक से बहने लगी और पानी के सोते में से लाल रक्त रंजित सा कुछ बहने लगा, मैंने अपनी नसों में वह दबाव महसूस किया और फिर अचानक से सब कुछ ठहर गया, पौधे एकाएक मेरे पर चढ़ आये और कमल के फूलों में उलझ गया मै और चाहकर भी सांस नहीं ले पा रहा था पता नहीं फंस गया.
सोचा था कि उसी छत पर रात गुजार दूंगा, पर तुमने आवाज दी तो लगा कि फिर से लौट आया हूँ उस धरती पर जहां सब कुछ फिर से एक लम्बी यातनादायी सुरंग में बस बदलने को था और जिस्म से लहू निचोड़कर किसी ने मुझे नीम बेहोशी में ठंडा कर दिया था, उफ़ कैसा भयानक ठहरा हुआ पल था जो कही जीवन, सपनों और हकीकतों के बीच से निकल कर पुनः पुनः लौट आता था बारम्बार और मै ठहरा सा देख रहा था आसमान, पानी झील बर्फ छत और कही नजर नहीं आ रहे थे तुम....

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