Saturday, January 3, 2015

विद्या अरुण साने का दुखद निधन



मेरी भाभी की माँ श्रीमती विद्या अरुण साने का आज दुखद निधन हो गया, देवास में नूतन बाल मंदिर से अपना काम शुरू करने वाली विद्या ताई शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण शख्सियत थी और उन्होंने उस समय एक छोटा सा स्कूल खोला था जब प्राईवेट स्कूल का नामोनिशान नहीं था. समाज के निम्न और मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए न्यूनतम फीस लेकर उन्होंने गुणवत्तापुर्व शिक्षा की बुनियाद डाली और देवास के पुराने स्कूलों में शामिल नूतन बाल मंदिर ने स्कूलों में इतिहास बनाया. श्रीमती शशिकला पोतेकर ने आज अंतिम यात्रा के समय कहा कि "आमची मावली गेली हो, तिनीचं आम्हा सर्वाना उभ केलं, आणि जे पण आमच्या कड़े आहे ते सर्व इचच आहे."

सच कहा शशिकला ताई ने जो देवास की अन्य महान महिलाओं में से एक है. ये वो महिलाओं की पीढी थी जिन्होंने शिक्षा का बेहद जमीनी स्तर पर काम किया, सरकारी स्कूलों के समानांतर निजी विद्यालय खोले और उन्हें बेहद मामूली खर्च, सादगी और गुणवत्ता से संचालित किया. मुझे याद है नूतन बाल मंदिर, एवरेस्ट स्कूल, शिशु विहार (श्रीमती पटवर्धन द्वारा संचालित) ऐसे स्कूल थे जिन्होंने देवास की पीढियां सुधारी है. साथ ही "फ़क्त एकच प्याला" जैसे ख्यात मराठी नाटक के लेखक गडकरी साहब की पत्नी भी देवास के राधा बाई कन्या स्कूल की प्राचार्या थी जिन्होंने ने इंग्लैण्ड से गणित जैसे विषय में पी एच डी किया था तब जब महिलाओं को पढ़ने की भी इजाजत मिलना मुश्किल था. ऐसे समय में विद्या ताई, श्रीमती पटवर्धन और शशिकला ताई ने स्कूल खोले और इतने कम खर्च में और फीस में शिक्षा दान की कि घर खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था, पर इनके पतियों ने उन्हें बहुत संबल दिया और स्कूल चलाने में मदद की. तब शिक्षा एक मिशन हुआ करती थी आज जैसा धंधा नहीं, ना ही शिक्षकों को कभी इन लोगों को जलील किया. अभिभावकों को भी इनपर पूरा भरोसा था और वे भी इन्हें भरपूर सहयोग करते थे, देवास में इन तीन महिलाओं ने कठिन परिस्थितियों में रहकर परिणाम मूलक काम किया और वृहद् समाज से जुडी रही और आज भी सक्रीय है.

विद्या ताई साने बहुत ही सह्रदय महिला थी, इतनी सहज और लोक परोपकारी कि कर्फ्यू के समय ढेर खाना बनाकर ऑटो लेकर ड्यूटी कर रहे पुलिस के जवानों को खाना बांटने निकल जाती थी. मुझे याद है बाबरी मस्जिद काण्ड के समय जब देवास में कर्फ्यू लगा था तो वे एक ऑटो में ड्यूटी पर तैनात जवानों को खाना बाँट रही थी कि "इन बेचारों को खाने का कौन पूछेगा". साथ ही यदि उनके घर में किसी को कोई चीज पसंद आ जाये तो सहर्ष दे देती थी चाहे वह चीज हजार की हो या दस रुपये की. उनके विद्यार्थी आज यहाँ वहाँ फैले है और ख्यात है. स्व पंडित कुमार गन्धर्व की सुयोग्य पुत्री और प्रख्यात गायिका विदुषी कलापिनी Kalapini Komkali भी उन्ही की शिष्या रही है और आज भी पिन्नी का उनके घर आना जाना बना हुआ है.

संसार में ऐसे लोगों के फ्रेम ही ख़त्म हो गए है जहां ऐसे बिरले लोग बनते थे, आज विद्या ताई के निधन के साथ देवास के शिक्षा जगत से एक सुनहरा पन्ना ख़त्म हो गया, अपनी मेहनत और काबिलियत से उन्होंने हजारों बच्चों की जिन्दगी बनाई और सादगी से जीवन जिया इतना सादगी से विश्वास करना मुश्किल होता है. सौभाग्य की बात यह है कि मेरे बड़े भाई संजय की वो सासु माँ थी. उनकी याद, कामों और शिक्षा के अवदान को नमन और अश्रुपूरित श्रद्धांजलि.

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