Wednesday, October 7, 2015

Post of 6 Oct 15


ये जो सात सुर थे सितार से लेकर तुम्हारे कण्ठ में, जो सजते थे तो भोर हो जाती थी और पहाडो पर धूप खिल जाती थी, रातरानी महक उठती थी और रात किसी मालकौंस की तरह आहिस्ते से गुजर जाती थी, पर सुनने की कोशिश कर रहा हूँ यहां इस नदी के तलछट पर और सागर के निर्जन छोर पर तो आज मद्धम पड़ रहे है सारे सुर, तबले की थाप कर्कश हो रही है, वीणा में से झनकार खत्म हो गयी है, हारमोनियम अवरुद्ध होकर रूठ गया है और आरोह अवरोह की दौड़ में मैं खोता जा रहा हूँ शायद अब भैरवी ही विकल्प है इस अंतिम पहर की यवनिका में। एक आसमान झुक आया है नीचे तक और धीरे से बीन रहा है अपने अवशेष जो क्षितिज से टूटकर किसी तानपुरे के सुरों से होते बाँसुरी की धुन में लिपटे आ गए थे मोगरे के फूलों की सुवास में खींचकर ..

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