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Posts of 30 Aug to 1Sept 15

शहरों को इतनी तेजी से बदलते हुए देखकर बहुत खुशी भी होती है और दुःख भी क्योकि इस विकास में बहुत लोगों के आंसू छुपे है और चकाचौंध के पीछे हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों की दास्तान कही ख़त्म कर दी गयी है. सिवानी ऐसा ही एक शहर नजर आता है आज से चार साल पहले यानी सन 2008-10 तक मै इस शहर में इतना आया हूँ कि यह अपना सा लगने लगा था पर आज जब कदम यहाँ पड़े तो लगा कि कितना बदल गया है और कितनी जल्दी........पता नहीं पर अच्छा लग रहा है. रोमांचित हूँ , मंडला से बेहतर और काफी मॉडर्न होता यह ठंडा  सा शहर आज धड़क रहा है बाजार,, भीड़, दुकानें और ब्रांडेड सामान की दुकानें, चौराहों पर ट्राफिक सिग्नल और खूब चौड़ी सड़कें वाह.........दिल करता है यही बस जाऊं !! आजकल ना जाने क्यों हर शहर से गुजरता हूँ तो वही बस जाने को दिल करता है - नए लोग, नए विचार, नई कल्पनाएँ और नई उम्मीदें .........तो क्या हम उम्मीदविहीन समय में रह रहे है? खैर .............. एक जुग बीत गया तुम्हारी याद में और तुम तो कोलावरी डी को भी भूल गए , इतनी जल्दी सब कुछ भूलकर कैसे जी लेते हो और यहां तो अभी दिल जलता है तो जलने दे ही अंदर घुमड़ र...

एक जुग बीत गया तुम्हारी याद में -दशरथ मांझी केतन मेहता की नजर से

केतन मेहता ने जरुर सोचा होगा कि यह नेतृत्व विहीन समय है और जब इस समय सारा देश और समूची मानवता एक गहन अन्धकार से गुजर रही है तो वे एक बुलंद नारे के साथ आते है जो सिर्फ शब्द नहीं वरन अपने आप में समूचे बदलाव की ओर इंगित भी करते है, और एक परिवर्तनकामी दिशा भी देते है. इस समय में जब आस्थाएं धुंधला गयी है, रोल मॉडल फेल हो गए है, विखंडित व्यक्तित्व अपने दोमुंहेपनसे लबरेज है और समय के चक्र में पीसता बेबस, लाचार आदमी लगातार हर मोर्चे पर जूझ कर अंततोगत्वा हारकर निढाल हो गया है - तो वे एक नारा ठीक दुष्यंत की तर्ज पर बुलंद करने की कोशिश करते है व्योम में कि कही कोई उठे और फिर ललकार करें कि "शानदार, जबरजस्त और जिंदाबाद". ये तीन शब्द नहीं पर एक खुले आसमान में पत्थर उछालने की अपने तई इमानदाराना कोशिश भी है. इस पुरे संघर्ष में एक जग से छिपी प्रेमाग्नि भी है जो सिर्फ ना पहाड़ को काटती है वरन एक समूची डूब रही सभ्यता और उस जाति  को धिक्कार करने का जज्बा भी पैदा करती है जो अपने आप को बेबीलोन की सभ्यता से आगे सिन्धु घाटी के किनारों से होती हुई जेट युग में प्रवेशकर दुनिया का "जगसिरमोर" ...

Posts of 26 Aug_15

देश जल रहा है महंगाई, आरक्षण और प्रतिशोध में और देश के प्रधानमंत्री को रक्षा बंधन पर गरीब की जेब से बारह, दो सौ या तीन सौ रूपये छिनने में शर्म नहीं आ रही, अम्बानी और अडानी और बिरला के लिए बटोर रहे है कि अपनी पुश्तों का कर्ज मानो चुकाना हो..... विज्ञापनों का मायाजाल - बचो - बचो, इनसे बचो............ . मै देश के सत्रह मुख्यमंत्री, बीस राज्यपाल, एक प्रधानमंत्री, सत्तर प्रतिशत केबिनेट मंत्रीमंडल, सभी राज्यों में अस्सी प्रतिशत मंत्रीमंडल, आधे से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में बैठे बेंच में न्यायाधीशों में और राष्ट्रपति पद के लिए इस महान भारत देश में आरक्षण की मांग करता हूँ. विचित्र देश है आपका महाराज, जो आग लगाता है वही शान्ति की अपील भी करता है ....... ॐ शान्ति शान्ति शान्ति .. शर्म आती है कि हमें सबको आरक्षण चाहिए ना अपनी योग्यता बढ़ाना चाहते है ना दक्षता ना कौशल बस घटियापन से सड़कों पर उतर आते है, जिन्हें आरक्षण मिल चुका है वे भी दशकों से ले रहे है इसका फ़ायदा और फिर भी अभी पीढी दर पीढी इसे भकोसना चाहते है, कुल मिलाकर सत्ता की गुलामी करके वही के...

Posts of Week 18 to 25 Aug 15

इलाहाबाद से लौटकर काम और द्वाबा उत्थान एवं विकास समिति की सुखद स्मृतियाँ और कौशाम्बी जिले में भयानक बदतर हालत कुपोषण की, बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं में सबसे ज्यादा असर सपा सरकार और घटिया राजनीती के शिकार, परन्तु निष्क्रिय प्रशासन और व्यवस्था पाकर दुःख हुआ. एक तस्वीर काम करने वाले जांबाज सिपाहियों के साथ जिसके नेता परवेज भाई है, दूसरी तस्वीर मित्र  Santanu Sarma  के साथ और तीसरी तस्वीर बाल मजदूर को लेकर लिखी गयी अदभुत कविता जो पुरे हालात का जिक्र करती है उसके जीवन का. सही कहा था आलोक ने जीवन में छोटी सी उम्र बिताने के लिए दो चार लोगों का और दो चार दोस्तों का होना ही पर्याप्त है. अब अपने शहर और अपने लोगों को, दोस्तों को इतने लम्बी अवधि के लिए छोड़ने की हिम्मत नहीं होती.............ये उम्र का असर कह लें या स्नेह के बंधन, अपनी फिजां की आदतें या अपने पेड़ पौधों की महक पर अब नहीं होता और अब सोचकर ही इतना लंबा निकलूंगा.... शहर जितना बड़ा होता है उतना ही निष्ठुर होता जाता है ऐसे में लोग अपनी प्राथमिकताएं तय करते है तो कोई गलत नहीं बस धिक्का...

सतना को भूला नहीं हूँ आज भी - शुक्रिया कुलदीप 21/8/15

सन 1993-95  की बात है, सतना में अनुपमा एजुकेशन कान्वेंट ने चित्रकूट ग्रामोदय विवि का बी एड का अध्ययन केंद्र लिया था और मै भी बी एड करना चाह रहा था यह दूर वर्ती शिक्षा के माध्यम से होना था और फीस भी कम थी सो प्रवेश ले लिया तब देश बहर से कई लोगों से सम्बन्ध बने थे. नफजगढ़ दिल्ली का एक युवा जो बहुत गुस्सैल था नाम था कुलदीप कुमार जो अपने पिताजी के साथ आया था प्रवेश लेने पर एक डेढ़ साल में ऐसा कुछ रिश्ता बना कि वो भाई मानने लगा. और फिर कोर्स पूरा होने के बाद सब छुट गया. मेरे जीवन में सतना का बड़ा महत्त्व है और यदि कभी ईश्वर ने पूछा कि (यदि ईश्वर है और पुनर्जन्म होता हो तो)  कहाँ जन्म लोगे दोबारा तो कह दूंगा कि अगला जन्म सतना में लूंगा.  खैर, इस सारे मामले में अच्छी बात यह है कि आज लगभग पच्चीस बरस बाद कुलदीप ने फेस बुक पर मुझे खोज निकाला और एड किया मै देखते ही पहचान गया, कुलदीप ने दो तस्वीरें भेजी की कि मै पहचान लूं, ऐसा हो सकता है कि मै अपने दोस्तों को भूल जाऊं भाईयों को भूल जाऊं. कुलदीप को मैंने तब काम कर रहा था उस संस्था की एक गीतों की किताब भी बहंत की थी जो उसने आजत...

Posts of 17 Aug 15

अम्बानी   और अडानी के लिए तेल लेने के लिए क्या क्या करना पड़ रहा है, इधर सारा देश राम राम, काश्मीर, 370 धारा हटाओ, आतंकवाद, पाकिस्तान मुर्दाबाद , हजार सर लेकर आओ, ललित गेट, संघ और भाजपा कर रहा है और उधर वे शेख, मुल्लों और मस्जिदों में अल्लाह खोज रहे है. 34 साल   बाद किसी मुखिया को अपने आकाओं के लिए तेल - तेल करते हुए मस्जिदों में मत्था टिकाते हुए मजबूरी वश देखा, ऐसी भक्ति को प्रणाम और ऐसे वफादारों को भी दिल से सलाम, दोस्ती हो तो ऐसी. बढ़िया है लगे रहो..........बस अब नागपुर में जाकर सफाई देनी होगी एक बार आने के बाद.  वैसे   मजाक के अलावा यह कदम मोदी जी की अपने आसपास के देशों में प्रतिष्ठा बढ़ाएगा, मै उनके इस कदम की सराहना करता हूँ. यह समय की मांग है और अब समय आ गया है कि जाति समुदाय के दंश से निकलकर नेता देश और भले की सोचे. मोदी जी सच में यह जाति धर्म समुदाय का चश्मा उतार फेंके और अपने तई निर्णय लें, छोड़े संघ को और कूप मंडूक रैली निकालने वाले भगवा धारियों को, फिर देखें कि कैसे हम सब लोग उन्हें दिल से समर्थन देते है और मदद करते है. अच्छे दिन सच में ऐसे ही आय...

Posts of 16 Aug 15

मप्र पर्यटन विकास निगम मांडव में इस सीजन में कई प्रकार के उत्सव आयोजित करता है परन्तु कल जो इस कसबे की बदहाली देखी वह अकल्पनीय थी और बेहद शर्मनाक. हर जगह भीड़ और ट्राफिक का कोई इंतजाम नहीं. रूपमती महल पर जब भयानक जाम लगा तो कोई ओपी वर्मा और एक चौहान पुलिस वालों को मैंने कहा कि स्थिति गंभीर हो रही है कुछ हादसा हो सकता है तो उन्होंने स्थानीय प्रशासन को गाली देते हुए कहा कि साला पचास साठ मरेंगे नहीं लोग तब तक आना बंद नही करेंगे और सुधरेंगे नहीं - इतनी भीड़ है हम भी क्या करें , मर ने दो मरते है तो. जब बगडी वाले रास्ते पर जाम हो रहा था तो मैंने पुलिस वालों से कहा कि अभी सम्हाल लो वरना दिक्कत हो जायेगी तो बोले हो जाने दो तीन चार घंटे जाम में फसेंगे तो सब आना भूल जायेंगे और फिर जाम रात तक तो खुल ही जाएगा, और उस तरफ हमारी बीट नहीं है, आप अपना काम करो...... ये हालत है प्रशासन की, जिला प्रशासन को इस बात से कोई मतलब नहीं है , जो अधिकारी वहाँ थे, वे मालवा रीट्रीट में भोपाल से आये अधिकारियों की लाल बत्ती का ख्याल रख रहे थे, दूसरा ट्राफिक जाम में मैंने भो...