धर लगभग सूखा है, गर्मी और उमस ने जीना बेहाल कर रखा है, सुबह से गर्मी और उमस अपना साम्राज्य पसार देते है, थोड़ा दिन निकलते ही धूप बिखर जाती है और शाम को धूल और धुएँ के बादल - ऐसे में जीवन की अनेक परतों के बीच उदासी की धमक भीतर धंस जाती है, रात करवटें बदलते हुए कब पूरी हो जाती है - ख्याल नहीं रहता
अब ये अक्सर हो रहा है इसलिए सामान्य लगता है, कभी लगता था कि यह डिप्रेशन या एंग्जाइटी हो या अपने स्क्रीजोफेनिक होने का भय, पर फिर लगा कि आसपास का माहौल ही सबको अपने चपेट में ले रहा है और कोई इससे बचा नहीं है, भीतर धंसी उदासी की जड़े जब गहरी होते जा रही और इसके फ़ल रोजमर्रा पर असर डालने लगे है, तो लगता है कि यह सिर्फ मौसम, सूखा, अवाँगर्द जीवन या यायावरी के परिणाम नहीं - बल्कि अवचेतन के अपने जाये दुख है और वे दुखद स्वप्न है जो अजन्मे रहें और त्रिशंकु से लटके रहें कही व्योम में
उदासियों के बीच एक - एक क्षण का हिसाब और गुजरते जा रहें समय के साथ आने वाले गंतव्य की व्याकुलता अब ज्यादा बेचैन कर रही है और इंतजार में आसमान को ताकना और फिर पुनि - पुनि अपने को हिम्मत के साथ समेटे मन की गठरी बांधकर तैयार करता हूँ कि कही ऐसा ना हो कि वो आए और मैं मोहपाश में पड़कर विचलित हो जाऊँ और रास्ता भटक जाऊँ और फिर एक जुंबिश के इंतजार में सदियों तक यही बेचैनियों के साथ बैठा रहूँ, इसलिए सब छोड़ना है, त्याग करना है और बंधनों से मुक्त होकर किसी जंगल की - जहाँ सूरज की किरणें भी नहीं आती - किसी मटमैली सूनी पगडंडी पर चुपचाप नीम तले बैठ जाना है - एक बेसब्र और व्याकुल मुसाफ़िर की तरह - जिसकी बस आने को है और सबको ले जाएगी सब कुछ छोड़कर
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जीवन में आप जितना आगे बढ़ते जायेंगे - उतने खतरे आप पर बढ़ते रहेंगे, आपकी निंदा, स्तुति, बदनामी और उस सबके लिए तैयार रहियेगा - क्योंकि आपको लोग ना आगे बढ़ते हुए देख सकते है और ना खुश देख सकते है, आपके चरित्र हनन से लेकर आपकी हत्या की सुपारी तक लेने और देने को लोग बेचैन है - बगैर यह भूले कि उनके अपने घर से लेकर व्यवहार, हिसाब - किताब और चरित्र में या आसपास कितने दागदार लोग है और वे सिर्फ आँखें मूंदकर निभा रहें है हर तरह की अव्यवस्था या संबंध, रीढ़ की हड्डी तोड़ दे तो फिर सब आसान हो जाता है - धन से लेकर यश और कीर्ति कमाना, अंग्रेजी में बेहद गंदे तरीके से कहते है - You should have balls and guts to bear all and face ...
इसलिए अब मैंने अब ऐसी बातों पर यकीन करना भी छोड़ दिया है और गंभीरता से लेता भी नहीं हूँ - जो है वह सब ठीक है - लोग है कुछ तो बोलेंगे, करेंगे और उनके पास भी समय बीताने को कुछ तो चाहिए और इस तरह की गॉसिप किसको अच्छी नहीं लगती, बेहतर है अपना काम करो और भाड़ में जाने दो दुनिया को, सच कहने पर सब उतर आयेंगे तो सबके मुखौटे उतरते जायेंगे - फिर वो चरित्रगत हो, आर्थिक हो या विचारधारा के
साधौ ये मुर्दों का गांव .... कबीर कह गए है ना, बस अंत में इतना ही कि समय के साथ संबंध तोड़ते जाइए - कोई कितना भी अपना हो, जीवन का सबसे बड़ा जोखिम ये परिचित ही होते है जो सच सह नहीं सकते और सबसे पहले ये ही बिन कहें न्यायाधिपति बनते है आपके जीवन के
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अपने बच्चों को अपने पास रखिए - मत भेजिए बाहर, शिक्षा में चालीस साल काम करके यही समझ आया है कि मटके में पानी उतना ही आयेगा - जितना घर के नल में - आप चाहे उसे समंदर में रख दो
अबोध किशोर या युवाओं को किसके भरोसे बाहर भेज रहे हो आप, इस सरकार के - जो खुद गैर जिम्मेदार, लापरवाह, भ्रष्ट निकम्मी, और हरामखोर है, न्यायपालिका के भरोसे - जिसके न्यायाधीश करोड़ों के नोट जला देते है और फिर भी नौकरी करते रहते है, मीडिया के - जो दलाली के अलावा कुछ नहीं कर रही
बच्चे आपके बुढ़ापे का सहारा है, आपने मन्नतों से पैदा किया, हसरतों से पाला - अपना पेट काटकर और भेज दिया - एक गैर जवाबदेह तंत्र के भरोसे, गलती बच्चों की नहीं - आपकी है, या तो आप खुद जाकर साथ रहिए या फिर उन्हें अपने पास रखिए - जैसा भी हो आधी रोटी खाकर गुजर - बसर करिए, पर अपनी महत्वकांक्षाओं के लिए अबोध बच्चों की बलि मत चढ़ाइए मेहरबानी करके
देवास का यह किशोर देखिए कितना छोटा है और दिल्ली या कोई भी महानगर लील जाते है जीवन, हम सबको पता है - फिर भी आपको समझ नहीं आ रहा
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रक्षाबंधन मनाकर लौटा था देवास का अर्पित कल सुबह ही साढ़े नौ बजे दिल्ली पहुंचा और दोपहर डेढ़ बजे खत्म हो गया - उफ्फ, कितना दर्दनाक है यह सब, दो लाख के मुआवजे से क्या यह सरकार हमारे शहर का किशोर लौटा सकेगी, कब तक हम नागरिक के रूप में चुप रहेंगे और हिंदू - मुस्लिम, मंदिर - मस्जिद में उलझ कर अपने जीवन से समझौते करते रहेंगे, अस्सी साल के बाद मूल सुविधाएं और देखरेख का तंत्र यदि हम ईजाद नहीं कर पाएं है तो लानत है ऐसी सरकार पर और पूरे तंत्र पर, डूब मरो कही जाकर नालायकों
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